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नई सुबह
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नई सुबह Voice and Text
     
नई सुबह से पहले (उन्नीस)
ISBN: 81-901611-13

निरा’श मन लिए वे लौट आए। रमे’श ने बहुत समझाया, ढाढ़स बंधाया, वे नहीं माने। अमित चुप था। बिल्कुल गुमसुम। उसने स्वयं को असहाय पाया, वीणा के लिए कुछ करना चाहता था, कोई जादू-टोना नहीं जानता था, जो कुछ कर पाता।

वीणा थी कि हँसी भूल गई थी। बस बात-बात पर आँसू बहाती थी। लेकिन न जाने किस मिट्टी की थी कि वह देव की बुराई नहीं सुन पाती थी। देव की, देव के परिवार की बुराई करने वाला उसे अपना दुश’मन लगता था। यहाँ तक कि अपनी बड़ी बहन सुनीता भी बुरी लगने लगी थी जबसे उसने दिल्ली आकर देव के प्रति ढ़ेर-सी ’शिकायतों का पुलिन्दा वीणा के सम्मुख खोला था, अपनी हमदर्दी जताई थी उसने जब वीणा के प्रति यह कह कर कि ‘‘वीणा। तुम्हारे साथ धोखा हुआ है, चलो यहाँ से। नहीं रहना तुम्हें यहाँ, देव के साथ। क्या दिया है उसने तुम्हें। नौकरानी से भी बदतर जिन्दगी बन गई है तुम्हारी।’’

यह सुनकर वीणा बहुत रोई थी। और जब चुप हुई तो दो शब्द बोलकर उसने सुनीता का मुँह बन्द कर दिया था - ‘‘बड़ी बहन हो फिर भी अपनी छोटी बहन का सुहाग उजाड़ना चाहती हो। मुझे नहीं चाहिए तुम्हारी हमदर्दी। मेरे देव में कोई खोट नहीं। यदि दोष है तो केवल मेरे भाग्य का। बस, आज के बाद तुम इस विषय में कोई बात नहीं करना।’’

कुछ देर तो सुनीता चुप रही, लेकिन बड़ी बहन थी उसकी। हितैषी भी थी वीणा को बोलने से रह नहीं पाई - ‘‘तुम कौन से युग की बात कर रही हो ? सच्चाई तुम्हारे सामने है। शादी के बाद एक दिन भी सुख का मिला है तुम्हें? शादी की है, शादी होती है क्या बस सुबह-’शाम, दिन-रात पति के सिराहने बैठकर उसकी मालि’श करने के लिए? उसे जब-तब दवाई खिलाने के लिए? उसकी गन्दगी साफ करने के लिए? उन्हें शादी करनी जरूरी थी क्या, इस सबके लिए? एक नर्स ही रख लेते, भाई अमीर हैं सब खर्च सहन करते हैं क्या नर्स का खर्च सहन नहीं कर सकते थे ?’’

‘‘बस भी करो दीदी तुम, मुझसे नहीं सुना जाता यह सब’’ -वीणा ने आँसू बहाते हुए कहा।

‘‘क्यों बस करूँ? आज तुम्हें मैं दु’शमन लग रही हूँ – तुम्हारे सुहाग की दु’शमन। कल जो होना है उसे तुम जानती हो, क्या कर लोगी तुम? कैसे काटोगी तुम जिन्दगी।’’ - सुनीता बहुत स्पष्टवादी थी। ’शब्द वही प्रयोग करती थी, जो उसका मन कहता था। चाहे कितने कठोर शब्द क्यों न हों।

‘‘मुझे कल क्या करना होगा, अभी नहीं सोच रही। बस मुझे आज की चिन्ता है, मुझे अपने देव की चिन्ता है। वह मेरा है और उसे मुझसे कोई अलग नहीं कर सकता।’’ वह रो रही थी और रोते-रोते बोले जा रही थी - ‘‘मुझे देव से शारीरिक सुख नहीं प्राप्त हुआ, इसका मुझे कोई गम नहीं। मेरी शारीरिक भूख से ज्यादा बड़ी भूख मेरे मन की है। मेरा मन देव को पाकर तृप्त हो गया है। उसे बीमारी न होती तो क्या कमी थी उसमें? बोलो - जब वह देहरादून आया था तो कैसा लगा था तुम्हें? देवताओं की छवि देखी थी तुमने भी उसमें। कैसा तेज उसके चेहरे पर महसूस किया था। आज वह अपनी जिन्दगी के लिए तड़प रहा है तो मैं उसे छोड़ जाऊँ? इतनी जल्दी साथ छोड़ने के लिए नहीं हुई मेरी उससे शादी। वह अच्छा इन्सान है, उससे तब तक बंधी हूँ जब तक वह है। उसका नाम है। वह नहीं रहेगा अभी से उसकी कल्पना नहीं कर सकती। अभी आ’शा है, शायद कोई चमत्कार हो जाए। उसके नहीं तो मेरे भाग्य से ही।’’

- वीणा चुप हुई तो सुनीता को उस पर बहुत प्यार आया। उसे अपनी बाँहों में भर कर उसे पुचकारते हुए बोली - ‘‘मैं तुम्हारे मन को समझती हूँ। लेकिन पगली मैं तेरी दु’शमन हूँ क्या? तुझे यूँ तिल-तिल कर पल-पल बिताते देखकर मैं चुप देखती रहूँ। अच्छा लगेगा मुझे ऐसा? तेरे साथ बचपन बिताया है सारा। हर खुशी, हर दुःख में साथ दिन बिताये हैं। मुझे अच्छा नहीं लगता तेरा यह रूप, मैं क्या करूँ? कोई उपाय मेरे पास भी तो नहीं? का’श! मैं कोई जादू-चमत्कार कर सकती। लेकिन क्या है? दिखता कुछ नहीं, बस धोखे के सिवाय। मेरी बुद्धि मेरे हिसाब से ही चलती है।’’- तब सुनीता भी बहुत रोई थी।

...

रीटा देव के साथ खालसा कॉलेज में लेक्चरार थी। देव से मिलने आई। तब देव सो रहा था। वह वीणा के पास बाहर ही बैठ गई। देव के विषय में पूछने के बाद वह बोली - ‘‘कल मेरे एक रिश्तेदार आए थे घर। उन्होंने मुझे बताया कि यहाँ दिल्ली बार्डर पर एक गाँव है बकोली। वहाँ एक बाबा जी रहते हैं, अनाथ आश्रम बना रखा है उन्होंने। साथ ही वह जड़ी-बूटियों से कई असाध्य बीमारियों का इलाज करते हैं। तुम एक बार देव को लेकर वहाँ चली जाओ। शायद कुछ चमत्कार हो जाए।’’

रीटा की बात सुनकर वीणा के चेहरे पर आशा की किरण चमक उठी। वह बोली - ‘‘हाँ, जरूर जाऊँगी मैं। कल ही। अभी अमित आएगा, आप उसे सही पता बता देना।’’

तब रीटा ने कहा, ‘‘पता बिल्कुल आसान है। अलीपुर से आगे बकोली गाँव में जाकर किसी से भी पूछ लेना बकोली वाले बाबा जी का पता।’’ - फिर कुछ सोचकर रीटा बोली - ‘‘तुम कहो तो मैं अपने रिश्तेदार को लेकर कल सुबह आ जाती हूँ।’’

‘‘नहीं-नहीं, आप कष्ट न करें। मेरे साथ अमित जाएगा। कोई परेशानी होगी तो मैं आपको बता दूँगी।’’ वीणा के चेहरे पर आ’शा की कई किरणें चमकने लगी थीं। रीटा चली गई और वीणा अपनी सास के पास जाकर सब बात बताने लगी। देव अभी सो रहा था।

सुबह सात बजे ही देव, वीणा और अमित बकोली पहुँच गए। आश्रम ढूँढ़ने में कोई कठिनाई नहीं हुई। आश्रम में उस समय प्रार्थना हो रही थी। उन सभी को वहाँ पहुँच कर बहुत अच्छा लगा।

वहीं खड़े एक सज्जन से उन्हें जानकारी मिली कि बाबा जी ने इस प्रांगण में अनाथ बच्चों के रहने की पूरी व्यवस्था के साथ-साथ, एक पाठशाला भी खोल रखी है और सुबह के समय लगभग चार घंटे रोगियों को निः’शुल्क दवाईयाँ बाँटने का कार्य भी करते हैं।

वहीं एक चबूतरे पर जाकर तीनों बैठ गए। अभी उनसे पहले केवल एक व्यक्ति और वहाँ बैठा था। दस-पन्द्रह मिनट की प्रतीक्षा के बाद बाबा जी वहाँ आ गए। तब तक करीब बीस लोग वहाँ आ चुके थे। देव का नम्बर दूसरा ही था। बाबा जी ने देव की नाड़ी की परीक्षा की। फिर बोले - ‘‘पेट की बीमारी से ग्रस्त हो तुम, लेकिन अब रोग बढ़ चुका है।’’

‘‘जी, बाबा जी, मेरा तीन वर्ष पहले ऑपरेशन हुआ था और मेरा गुदा ही निकाल दिया था।’’ अभी देव ने इतना ही कहा था कि बाबा फिर बोले - ‘‘ओह! तो तुम्हारे कृत्रिम मल द्वार बनाया हुआ है। और कैन्सर दुबारा फैल गया है।’’ - देव को आशाहीं थी कि बाबा को इतनी जानकारी होगी। उसका वि’श्वास जो कि वीणा का बनाया था, स्वयं बढ़ गया बाबा के प्रति। स्वीकृति में देव के हाथ स्वतः ही जुड़ गए। तब बाबा बोले - ‘‘देखो बेटा, तुम्हारा रोग इतना अधिक बढ़ गया है कि मैं तम्हें कुछ नि’श्चित होकर नहीं कह सकता। लेकिन ईश्वर की बनाई हुई इस प्रकृति से कई जड़ी-बूटियाँ मैंने इकठ्टी की हुई हैं। उनके सेवन से तुम्हारे विकारों का वेग कम जरूर हो जाएगा। आगे सब उसी ई’श्वर पर निर्भर करता है। मैं तुम्हें दवाई दे देता हूँ नियमित रूप से इसका सेवन करते रहना।’’

तब बाबा जी ने उन्हें प्रतीक्षा करने को कहा और भीतर अपनी कुटिया में चले गए। बाहर लौटे तो उनके हाथ में एक लिफाफा था जिसमें कई जड़ी-बूटियाँ पड़ी थीं। अपने एक ’शिष्य को उन्होंने पुकारा और समझाया - ‘‘सबको पीस कर कपड़े से छन कर दो और इनकी बराबर तीस पुड़िया बना देना।’’ फिर देव के आमुख होकर बोले - ‘‘नित्य चार पुडि़या खानी होंगी दूध के साथ। चाय, खट्टा सब बन्द। हल्का खाना और रसदार फल खाते रहना। दर्द के लिए तेल भी अभी दूँगा।’’

तब देव, वीणा व अमित ने झुक कर बाबा जी के चरण स्पर् किये। और वहीं मन्दिर के बरामदे में जाकर बैठ गए। दवाई तैयार होने में अभी देर थी।

एकाएक सब बदलने लगा। डर व्यक्ति को बहुत क्षीण कर देता है। मानसिक तनाव में बीमारी की गति भी तीव्र हो जाती है। मन अच्छा है तो सब अच्छा लगता है। मन दुःखी तो सब बदला-सा लगने लगता है। वीणा ने देखा, देव बुझ-सा गया है। चेहरे का तेज लुप्त हो गया है उसका। घर में जब भी अकेला पड़ता न जाने क्या सोचकर आँसू बहाने लगता। काया भी क्षीण पड़ गई थी उसकी। दाँयी टाँग अब दर्द के कारण नीचे नहीं रख पाता था। जब भी उठता वीणा का सहारा लेकर या फिर लाठी के सहारे। समय की मार ने उसे अधमरा कर दिया था। आज वीणा का सहारा था या फिर इस लाठी का सहारा। वही लाठी जो वह अपने बाबूजी के लिए खरीद कर लाया था कभी उनको बुढापे में सहारा देने को, आज वह उसका सहारा बनी हुई थी। और दूसरी लाठी उसे वीणा के रूप में ई’श्वर ने प्रदान कर दी थी। न जाने उसके किन अच्छे कर्मों का परिणाम थी वीणा! जिसने उसके जीवन में आकर जीने की तमन्ना बढ़ा दी थी।

वीणा को देखकर आँसू बरबस उसकी आँखों से बह निकलते थे। और वीणा थी न जाने किस मिट्टी की बनी गुडि़या। इस दुनियाँ में आई, बड़ी हुई - ब्याह रचाया - सुन्दर कल्पनाएँ की अपने भविष्य की। और देखते-देखते सभी कल्पनाएँ पंख लगा कर उड़ गईं। जीवन के ऐसे सत्य की उसने कभी कल्पना नहीं की थी।

रोती थी, कभी बाथरूम में जाकर, कभी अमित के पास बैठकर, कभी कृष्णा की गोदी में सिर रखकर, लेकिन देव के सामने आकर भूल जाती थी अपने सब दुःख। बस उसे ही दिलासा देती थी।

बाबा जी की दवाई से कोई चमत्कार नहीं हुआ। किसी साधु-महात्मा को खाना खिलाकर चमत्कार नहीं हुआ। महामृत्युंजय का जाप करके भी कोई फल सामने नहीं आया। हाँ, एक महीना और बीता तो पाया अब सिर के पिछले भाग में कोई फोड़ा सा निकल आया है। देव ने छुआ उसे हल्का-सा दर्द महसूस हुआ।

वीणा को अपने मुँह से बताना चाह कर भी नहीं बोल पाया। बस, रुंधे गले से बोला - ‘‘अब कुछ नहीं शेष बचा, वीणा। अब मेरा-तुम्हारा कुछ दिनों का और साथ रह गया है। बस अब मैं चला जाऊँगा।’’ - रुलाई रोक नहीं पाया देव।

वीणा ने सुना, देखा उसे, निकट आकर देव के सिर में हाथ फेरने लगी। देव शायद यही चाहता था। पल भर में वीणा को पता चल गया कि क्यों फिर से देव आज वही पुरानी बात दुहरा रहा है।

‘‘ये क्या देव, एकाएक यह फोड़ा कैसे हो गया?’’ वीणा देव के सिर के बालों को अपनी अंगुलियों से हटाते हुए बोली ‘‘रात तक तो कुछ नहीं था।’’

‘‘बस, अब कुछ नहीं रहा शेष। लगता है ये कैंसर मेरे शरीर में फैल गया है।’’ देव के आँसुओं का वेग बढ़ने लगा था।

‘‘देव! ऐसा मत बोलो। अपने मन को काबू में रखो। अभी कुछ नहीं हुआ। अभी चलते हैं डॉक्टर के पास... वही बताएगा क्या है यह?’’ वीणा बोली, जैसे अभी भी डॉक्टर का सहारा शेष बचा हो उसके पास।

‘‘कौन से डॉक्टर के पास? - कौन है जो इस घड़ी कह रहा हो कि अभी कुछ नहीं बिगड़ा, अभी देव बच सकता है?’’ – देव का आक्रो’श था जो फूटा, लेकिन वीणा उसे सभाँलते हुए बोली - ‘‘डॉक्टर के न सही, बाबा जी के पास ही चलते हैं। कुछ न सही, इसको बढ़ने से रोकने की दवा हमें शायद उनके पास से मिल जाए - वीणा हिम्मत जुटा रही थी।

लेकिन देव की दशा इसके विपरीत थी, बोला - ‘‘बहुत भोली हो वीणा, अब क्या करेंगे बाबा जी? उन्होंने कहा था कि रोग बहुत बढ़ चुका है, इसके वेग को कम करने की को’शिश करेंगे।’’

‘‘ईश्वर पर वि’श्वास रखने को भी तो कहा था।’’ बोली वीणा - ‘‘देव! अब तुम कुछ हठ न करो। मुझे दे दो सब चिन्ताएँ अपनी, सब दुःख अपने। मैं रोक सकी तो रोक लूँगी सब कुछ। अब तुम मेरे भाग्य को मुझे स्वयं बनाने दो। तुम अब मेरे वि’श्वास को सहारा दो। मुझे अपने लिए कुछ करने दो। ’’ - वीणा रो भी रही थी, लेकिन अपनी वेदना को अपने शब्दों में व्यक्त करने की को’शिश भी कर रही थी।

देव ने समझा उसे। उसके मनोभावों को। समझाया स्वयं को और बोला - ‘‘तुम जो कहोगी, जो चाहोगी, वही करूँगा। तुम आँसू न बहाओ, जहाँ ले चलोगी वहीं चलूँगा।’’

‘‘बस, अब चलो बाबा जी के पास।’’ वीणा ने निर्णय सुनाया - ‘‘तुम्हें मैं झटपट तैयार करती हूँ, अब जो भी होगा देख लेना चमत्कार ही होगा।’’ - सच की रोशनी इतनी तीव्र हो चुकी थी कि वीणा की आँखें चैंधिया-सी गई थीं उसमें। कुछ शेष दिखाई देना बन्द हो गया था। सच, कैसा है इसका वर्णन तो वह बन्द आँखों से कर नहीं सकती थी। उसे लग रहा था, सच है उसका देव। देव का जीवन, जिसे उससे कोई छीन नहीं सकता।

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