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नई सुबह
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नई सुबह Voice and Text
     
नई सुबह से पहले (अट्ठारह)
ISBN: 81-901611-13

सांताक्रुज एयरपोर्ट से बाहर आते ही टैक्सी वालों से मालूम पड़ा की बम्बई बन्द है - शिव सेना वालों ने हड़ताल करवा रखी है और सड़कों पर ट्रैफिक नहीं चलने दिया जा रहा। वहाँ से कोलाबा पहुँचना लगभग असम्भव था। अब क्या करें? तभी वीणा को ध्यान आया। उसके दूर के रि’श्ते की मौसी का एक लड़का अन्धेरी में कहीं रहता है। लेकिन घर का पता भी नहीं था। हाँ, उसे याद आया, उसकी सास का पैट्रोल पम्प है। वहीं सांताक्रुज के पास। उसने देव को बताया और टैक्सी वाले से पूछा - ‘‘अन्धेरी तक नहीं जा पाएँगे।’’

‘‘वो तो नजदीक है, उस तरफ अभी गड़बड़ नहीं है। वहाँ तो जा सकते हैं।’’ टैक्सी वाले ने कहा।

‘‘लेकिन हमारे पास पता नहीं है, बस इतना मालूम है उनका ही सांताक्रुज में पैट्रोल पम्प है।’’ - वीणा ने तब उसे बताया।

‘‘सांताक्रुज में तो पाँच-छः पैट्रोल पम्प हैं। नाम मालूम है पैट्रोल पम्प का?’’

‘‘नाम तो मालूम नहीं, हाँ उस पम्प को एक औरत चलाती है। वही उसकी मालकिन है।’’

- वीणा ने और को’शिश की जानकारी देने की।

‘‘अरे, शरद पैट्रोल पम्प की बात कर रही हैं आप। चलिए। वह तो बस यहीं पास में है।’’

- टैक्सी वाले के मुँह से यह सुनकर सभी ने राहत की साँस ली और टैक्सी में समान रखकर पैट्रोल पम्प की ओर चल दिए।

ड्राईवर सीधा पैट्रोल पम्प पर उन्हें ले आया। वीणा और देव टैक्सी से उतर का पम्प के ऑफिस में गए। वहाँ बैठी महिला को वीणा एक नजर में पहचान गई। वह तीन-वर्ष पहले देहरादून में उनके घर आई थी और वहाँ दस दिन रही थी। महिला ने भी वीणा को देखते ही पहचान लिया - खु’शी से लपक कर उठी और उसे गले लगाती हुई बोली - ‘‘अरे! वीणा बेटी! ऐसे अचानक! मैं कोई सपना तो नहीं देख रही।’’

‘‘देख लीजिए। आपका पता ढूँढ़ लिया। चले थे तो ध्यान भी नहीं रहा कि घर से आपका पता मंगवा लेती। इनसे मिलिए ये मेरे पति हैं देव।’’ - वीणा ने देव का परिचय दिया। तब देव ने उन्हें प्रणाम किया।

वीणा ने तब उन्हें बताया ‘‘एयरपोर्ट से मालूम पड़ा कि बन्द के कारण सभी रास्तों में काफी तोड़फोड़ हो रही है। इसलिए इधर आपके पास चले आए।

‘‘अरे। कमाल है। अपना घर है चलो तुम वहाँ अजय होगा।’’

तब उन्होंने टैक्सी वाले को घर का पता बता दिया। ‘‘मैं शाम को आऊँगी तभी बात करेंगे।’’

देव-वीणा ने तब उनसे विदा ली। अमित तब टैक्सी में ही बैठा था।

अजय उस समय घर पर ही था। वीणा व उसके पति को देखकर बड़ी गर्म जोशी से उन्हें मिला। बातों ही बातों में देव ने उसे बीमारी का बता दिया। सब समाचार सुनकर अजय का मन बुझ-सा गया। सहानुभूतिव’श उसके मुख से निकला, ‘‘आप लोग यहीं रहकर अस्पताल आ जा सकते हैं। नेवी नगर से तो टाटा इन्स्टीट्यूट दूर पड़ता है।’’

‘‘नहीं, हम आप लोगों को कष्ट नहीं दे सकते। व्यर्थ में इतनी परेशानी होगी आपको। मेरे भाई ने हमारे लिए कुछ-न-कुछ इन्तजाम कर लिया होगा...।’’ - देव ने उसकी बात का उत्तर दिया।

‘‘परेशानी कैसी...। इसे आप अपना घर ही समझिए।’’ अजय ने जब यह कहा तो उसकी पत्नी रश्मि उठकर कमरे से रसोई की तरफ चली गई। उसके चेहरे के भाव वीणा को कुछ अच्छे नहीं लगे।

पाँच-सात मिनट बाद रश्मि ने अजय को किचन से पुकारा, ‘‘अजय, जरा भीतर आना। चाय तैयार है।’’ अजय उठने को हुआ तो वीणा ने उससे कहा, ‘‘तुम बैठो अजय। मैं जाती हूँ।’’ इससे पहले कि अजय कुछ बोलता वीणा भीतर चली गई। लेकिन रश्मि शायद अजय को ही बुलाना चाह रही थी। वीणा ने देखा रश्मि कुछ चुप-सी है। लेकिन उसके मनोभावों को पढ़ने की अपेक्षा मुस्कान बिखेरते हुए बोली - ‘‘लाओ, मैं तुम्हारी मदद करूँ?’

‘‘नहीं आप रहने दें। आप बैठिये, प्लीज, जरा अजय को ही भेज दें।’’ - उसने अपने चेहरे पर मुस्कान बिखेरने की चेष्टा की- ‘‘बाजार से कुछ मंगवाना है।’’

‘‘अरे नहीं, तकल्लुक की कोई बात नहीं...।’’ वीणा ने कहा। लेकिन रश्मि ने उसे फिर से कहा - ‘‘आप प्लीज बैठिये।’’ वीणा समझ गई। शायद पति-पत्नी की कोई बात हो।

‘‘अच्छा, जैसा तुम ठीक समझो। अभी भेजती हूँ अजय को।

- वीणा उलटे पैर वापिस लौट आई। भीतर आकर उसने अजय से कहा - ‘‘जाओ अजय, रश्मि तुम्हें ही बुला रही है।’’

अजय अनमना-सा उठा। भीतर गया और रश्मि से बोला

‘‘बोलो, डार्लिंग।’’

‘‘ये डार्लिंग-वार्लिंग छोड़ो। इस छोटे-से घर में तुम इन्हें किस बात पर कह रहे हो रखने के लिए। फिर सुना नहीं, उसके पति को कैंसर है। मैं तो घर में खाना नहीं खा सकूँगी।’’

‘‘अरे। यह कोई छूत की बीमारी तो नहीं। जानती हो, मैं देहरादून में उनके घर महीनों रहा हूँ। मेरी कितनी आवभगत की थी...।’’

‘‘वह तो ठीक है, लेकिन किसी बीमार को घर में रखना अपने बस की बात नहीं।’’ रश्मि ने साफ शब्दों में कहा, ‘‘फिर हम भी तो मम्मी के पास रह रहे हैं। उनकी छूआछूत को भी तुम जानते हो।’’

‘‘क्या कह रही हो, रश्मि। वो अपने हैं उनसे कैसी छुआछूत। मम्मी से पूछना, मम्मी की कितनी सेवा की थी उन्होंने।’’ अजय को अपनी पत्नी की बात पर गुस्सा आ रहा था। लेकिन जैसे कुछ अधिक कह सकने की हिम्मत नहीं थी उसमें।

‘‘... तो हम भी उनकी मम्मी की सेवा कर देंगे। - बस, अब तुम उन्हें बार-बार रुकने को नहीं कहोगे। जब बन्द खुल जाएगा तो स्वयं कोई सवारी का इन्तजाम करके या स्वयं उन्हें छोड़ आना तुम।’’ - रश्मि ने अपना फैसला स्पष्ट सुना दिया अजय को। अजय शायद रश्मि को नाराज नहीं करना चाहता था या उसे उसको नाराज करने की हिम्मत ही नहीं थी, उससे बोला, ‘‘चलो, ठीक है, कुछ न कुछ तरीके से उन्हें भेज देंगे। अभी तुम अपना मूड ठीक करो।’’ - वह बाहर चलने को हुआ कि रश्मि ने कहा - ‘‘अब चाय भी उठा कर ले जाओ। वरना वह समझेंगे न जाने क्या बात कर रहे थे।’’

अजय ने तब कुछ नहीं कहा। रश्मि ने चाय की ट्रे उसके हाथ में थमा दी। अजय को चाय लाते देखकर ही वीणा समझ गई कि बाजार भेजने के बहाने रश्मि उससे कुछ कहना चाह रही थी। क्या कहना चाह रही थी, वह समझ गई। उसने भी मन में ठान लिया कि वह भी यहाँ ज्यादा देर नहीं रुकेंगे।

चाय समाप्त करके वह स्वयं देव से बोली, ‘‘देव तुम भाई साहब से फोन पर बात कर लो। वह भी चिन्ता कर रहे होंगे। उनसे ही कहो किसी सवारी का इन्तजाम करके हमें ले जाएँ।’’

‘‘अरे। ऐसी क्या बात है? इतनी जल्दी क्या है।’’ – अजय ने एकदम से कहा। अजय को जैसे मन माँगी मुराद मिल गई थी। वीणा ने उसके चेहरे पर राहत के चिन्ह भाँप लिए थे। बोली, ‘‘नहीं अजय, भैया हमारी प्रतीक्षा कर रहे होंगे। हमारा उन्हीं के पास जाना ही उचित रहेगा।’’ - वीणा ने अपने शब्दों पर जोर डालते हुए कहा, इस पर अजय बोला ‘‘मैं तो केवल रिक्वेस्ट ही कर सकता हूँ आगे आपकी मर्जी। अभी कुछ देर आराम कर लीजिए। शोर-शराबा थोड़ा कम हो जाएगा। शाम को मैं ही ’शिवसेना की ऐम्बुलेंस का इन्तजाम कर दूँगा। उसमें जाने से कोई कठिनाई नहीं होगी।...’’

वीणा ने देखा रश्मि के चेहरे पर तब वही मुस्कान उतर आई थी जो उनके आने के समय उसने बिखेरी थी।

रमेश ने उनके ठहरने के लिए इन्तजाम कर लिया था। नेवी नगर में ही एक ऑफीसर एक महीने की छुट्टी पर जा रहा था। उसने उसके फ्लैट की चाबी ले ली। और उनको वहीं ठहरा दिया। वह स्वयं मेस में ठहरा था। मालती व बच्चे अभी गोवा में ही थे। देव को खाने पीने का काफी परहेज था, इसलिए उन्हें फ्लैट में ठहर कर अच्छा लगा। वीणा उसके लिए स्वयं खाना बना सकती थी।

अगले दिन अस्पताल जाने से पहले वे लोग चर्च गेट गए। वहाँ उन्हें मिस्टर ’शाह से मिलना था, जो संस्था के वरिष्ठ सदस्य थे। देव को, मिस्टर शाह की हैसियत नहीं मालूम थी। जब वे सभी उनके ऑफिस पहुँचे तो अमित व वीणा को एक बार झिझक हुई। मिस्टर शाह की कम्पनी व ऑफिस देखकर ही उन्होंने अनुमान लगा लिया कि वह कोई बहुत बड़े बिजनेसमैन हैं।

रिसेप्शनिस्ट को अपना परिचय दिया देव ने और वे प्रतिक्षा करने लगे। क्षण भर प’श्चात ही अन्दर से बुलावा आ गया। वीणा व अमित बाहर ही बैठे रह गए। देव अकेला भीतर गया।

मिस्टर शाह अपने कमरे में अकेले थे। देव को देखकर उन्होंने खड़े होकर देव के अभिवादन का उत्तर दिया और उसे बैठने को कहा। इससे पहले कि देव कुछ कहता, वह बोले - ‘‘मुझे आज सुबह ही मिस्टर गर्ग का फोन आया था। उन्होंने सारी बात बताई।

आप चिन्ता न करें। मैं अभी फोन करके डॉक्टर सामन्त से आपकी डेट फिक्स करवा देता हूँ। वह आपका अच्छी तरह से निरीक्षण करेंगे, ओर उसके बाद जो होगा वह तय कर लेंगे।’’ ‘‘आपका बहुत-बहुत शुक्रिया।’’ देव तब इतना कह सका। मिस्टर ’शाह फिर देव से उसकी बीमारी का पूछने लगे। देव ने विस्तार से उन्हें सब बता दिया। तभी जैसे कुछ ध्यान हो आया मिस्टर शाह को, बोले, ‘‘आप दिल्ली से अकेले आए हैं क्या...?’’

‘‘नहीं-नहीं, मेरी पत्नी व मेरा छोटा भाई मेरे साथ हैं। वह बाहर बैठे हैं।’’ देव ने उन्हें बताया।

‘‘अरे। आपने उन्हें बाहर क्यों बिठाया है?’’ इससे पहले कि देव कुछ कहता, मिस्टर शाह ने इन्टरकॉम पर अपनी रिसेप्शनिस्ट को वीणा व अमित को भीतर भेजने को कहा।

क्षण भर पश्चात ही अमित व वीणा भीतर आ गए। मिस्टर शाह ने उठकर उनका स्वागत किया और वीणा से कहा -‘‘मैडम, आप बिल्कुल फिक्र न करें। मुझसे जो बन पड़ेगा मैं मदद करूँगा। ऊपर वाला सबकी मदद करता है।’’

वीणा केवल मुस्कुरा सकी उनकी बात सुनकर। एक अजय व श्मि का व्यवहार और दूसरा मिस्टर ’शाह का। कितना अन्तर दिखा उसे अपने और पराये में!

‘‘देखिए! ओ.पी.डी. दो बजे शुरू हो जाती है। आप यहाँ से सीधे चलकर वहीं पहुँच जाईए। मैं अभी डॉक्टर सामन्त से बात कर लूँगा। अपना कार्ड बनवाकर आप सीधे ही उनकी सेक्रेटरी के पास चले जाना। वह आपको उनसे मिलवा देगी। कोई परेशानी हो तो आप मुझे फोन कर दीजिएगा। मैं सब संभाल लूँगा।’’

तब देव ने सबको उठने का इ’शारा किया। वे लोग उठे तो मिस्टर शाह ने उठते हुए देव से हाथ मिलाते हुए कहा - ‘‘मेरी ’शुभकामनाएं आपके साथ हैं। ईश्वर आपकी रक्षा करेगा।’’

वे सब उनका अभिवादन कर बाहर आ गए।

डॉक्टर सामन्त ने देव की सभी रिपोटर्स ध्यान से पढ़ीं। ऐसे केस उनके लिए आम-सी बात थी। बोले - ‘‘देखिए। फाईनल स्टेज तो नहीं आई लेकिन एक बात अब आपको समझ लेनी चाहिए, अब दवा से ज्यादा दुआ काम आएगी। मैं आपको दवाईयाँ लिख देता हूँ। वह नियमित रूप से लेते रहिए और कल से ही रेडियोथरैपी करवानी शुरू कर दीजिए।...’’

‘‘रेडियोथरैपी से कोई फायदा होगा, डॉक्टर?’’ देव ने पूछा।

‘‘हाँ, फायदा इतना होगा कि रोगाणु कम से कम स्पीड में

फैलेंगे।’’ बीमारी जड़ से तो खत्म नहीं होगी, लेकिन उसकी रफ्तार धीमी पड़ जाए यही हमारी को’शिश हो सकती है।’’ देव ने महसूस किया कि कैंसर का इलाज करते समय डॉक्टर अपनी-अपनी अलग राय रखते हैं। कोई मरीज़ को आशा की किरण दिखाता है और कोई निरा’श कर देता है। डॉक्टर सामन्त ने तब दवाई लिख दीं और पर्चा देव को थमाते हुए बोले - ‘‘आप अभी रेडियोथरैपी डिपार्टमेंट में चले जाईए और कल का कोई समय ले लीजिए।’’

बस इतनी सी बात हुई डॉक्टर सामन्त से। देव अपने साथ वीणा व अमित को लिए रेडियोथरैपी डिपार्टमेंट की ओर चल पड़ा।

अगले दिन सुबह नौ बजे का समय लेकर वे लोग नेवी नगर लौट आए। तीनों चुप थे। इस गहन चुप्पी को कोई तोड़ना नहीं चाहता था। लेकिन एक बात थी कि सच को सबने अपने गले से नीचे उतार लिया था। शाम को अमित ने विस्तार से सब बात रमे’श भाई को बता दीं। वे उसे बहुत अधिक चिन्तित लगे।

रेडियोथरैपी शुरू हुए सात दिन हो गए थे। डॉक्टर मालती थी जो देव का ट्रीटमेंट कर रही थी। वीणा देव के पास बैठी रहती थी। डॉक्टर मालती को बातों से मालूम हुआ देव के विषय में। वह उनसे काफी घनिष्ठ हो गई थी। ऐसे में एक दिन जब वीणा ने उनसे पूछा - ‘‘डॉक्टर! देव को इससे कुछ आराम मिलेगा भी?’’

तब मालती देव को ही निहार रही थी। मन में सोच रही थी कि इस मरीज के चेहरे को देखकर भला कौन कह सकता है कि यह बस कुछ दिनों या कुछ महीनों का मेहमान है। वह स्वयं भावुक हो उठी। तभी वीणा के प्रश्न ने उसकी भावुकता को और बढ़ा दिया। अभी जूनियर डॉक्टर थी लेकिन अपने मरीजों की मनोदशा को समझती थी। एकाएक उसकी आँखें भर आईं। बोली वीणा से, ‘‘मैं तुम्हें देखती हूँ वीणा तो बड़ा अजीब लगता है। कैसे सह रही हो यह सब? तुम्हारे पति को देखती हूँ तो सोचती हूँ कि ऐसा क्या इसी इन्सान के साथ करना था ईश्वर को ? कितनी सुन्दर जोड़ी है तुम्हारी! लेकिन इस रेडियोथरैपी से देव को कुछ नहीं मिलने वाला। जो होना था वह तो हो चुका। अब तो इस जिन्दगी को यदि कोई सुख दे सकता है तो वह केवल भगवान ही है। और कोई नहीं। मैं पहले दिन ही कह देती। लेकिन फिर सोचा तुम दोनों पढ़े लिखे हो। डॉक्टर से सारी बात कर आए हो। न जाने क्या है तुम्हारे मन में। लेकिन अब देखा, इतने दिनों से कि तुम सब जो कुछ समझ रहे हो, सच उससे अलग है। मैं जूनियर हूँ। अभी शुरूआत है मेरे डॉक्टरी जीवन की। लेकिन पाया है कैंसर का इलाज करते समय हम सब अन्धेरे में तीर चलाते हैं। सब कुछ करके देखते हैं। ’शायद मरीज़ बच जाए।’’

‘‘आपकी राय में इस रेडियोथरैपी से कुछ फायदा नहीं होगा?’’ देव ने पूछा डॉक्टर से।

‘‘फायदा नहीं होगा, बल्कि नुकसान ही होगा। तुम्हारे आखिरी दिनों में दर्द-तकलीफ ज्यादा होगी।’’ डॉक्टर मालती ने साफ शब्दों में कहा।

‘‘फिर मुझे क्या करना चाहिए।... मेरा कोई इलाज?’’ – देव जैसे स्वयं को तैयार कर चुका था।

‘‘इस अवस्था में कोई नहीं। बस, हिम्मत नहीं हारनी चाहिए।’’ डॉक्टर मालती ने आँसू पोंछ लिए थे, क्योंकि तब वीणा फूट-फूट कर रोने लगी थी। डॉक्टर मालती उसे चुप कराने लगी थी। थोड़ी देर में देव की थरैपी पूरी हो गई। अगली तारीख के लिए डॉक्टर मालती ने कार्ड में जैसे ही लिखना शुरू किया तब देव ने कहा - ‘‘नहीं डॉक्टर, मैं अब नहीं आऊँगा। मैं कल ही दिल्ली चला जाऊँगा।’’ तब डॉक्टर मालती ने कुछ सोचा और कहा - ‘‘जैसा तुम ठीक समझो।’’ मैं भी तुम्हारे लिए ईश्वर से प्रार्थना करूँगी! इससे पहले कि देव व वीणा बाहर निकलते वहॉ उठकर बाथरूम में चली गई। शायद वह अपनी रुलाई नहीं रोक पा रही थी।

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