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नई सुबह
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नई सुबह Voice and Text
     
नई सुबह से पहले (पंद्रह)
ISBN: 81-901611-13

बॉयोप्सी की रेपोर्ट आते ही घर भर में दुःख की लहर छा गई। कैंसर के कण रक्त में विद्यमान थे। डॉक्टर ने कहा था जीने की तमन्ना लिए रहो। हो सकता है जो है जहाँ है, वहीं रुका रहे और कई वर्षों तक कुछ न हो। यह बढ़ भी सकता है - एक दिन में भी और एक साल में भी। अभी दर्द है उसी के साथ जीना पड़ेगा। जब कुछ और शरीर में बदलाव आएगा, तभी बिमारी बाहर झलकेगी।

देव निराश मन लिए लौट आया। कुछ भी नहीं बोलने की स्थिति में था। दिन भर बिस्तर पर लेटा रहा। आज दर्द नहीं था। यदि था भी तो उसका कष्ट शरीर महसूस नहीं कर रहा था। मन की टीसें उससे कहीं अधिक थीं। वीणा दिन भर रोती रही। कौन ढाढ़स बंधाता उसे? माँ कृष्णा अपने पुत्र को हताश पड़े देखकर स्तब्ध थी। जवान बेटा उसका भीतर ही भीतर खोखला हो रहा है, उसे देखकर, उसके चेहरे को देखकर उसे विश्वास नही हो रहा था। देखने में भला-चंगा, कहीं डॉक्टर ही तो कुछ गलत नहीॆ कह रहे। वीणा को भी ढाढ़स बंधाते हुए वह यही बोली, "बेटी, मुझे तो लगता है डॉक्टर की रिपोर्ट झूठी है। देखो, देव को देखो, कुछ भी तो नही दिख रहा उसके चेहरे से। सब कुछ ठीक तो दिख रहा है। दर्द किसे नहीं होता? ऐसे में दर्द से क्या कैंसर की शुरुआत हो सकती है?"

माँ को क्या कहती वीणा? चुप रही। पिता श्रीराम शून्य में बैठे रहे। मन के भाव स्तब्ध थे। उन्ही को समझाने के लिए श्रीमद्भागवत गीता पढ़ने लगे। शायद गीता के शब्द उन्हें सांत्वना दे सकते थे। यही भाव उन्होंने वीणा के सम्मुख प्रकट किए, "बेटी! व्यर्थ चिन्ता मत करो। गीता का पाठ करो। देव को भी सुनाओ। देखना, मन को राह मिलेगी।"

वीणा तब भी चुप रही। कुछ न बोली। बस आँसुओ को रोकने का प्रयत्न करती रही।

यही उसकी दिनचर्या बन गई। देव को दर्द होता पानी की गर्म बोतल का सेक उसे करती। कभी दर्द की गोली खिलाती। कभी घंटों उसकी मालिश करती। आराम मिलता देव को तो कॉलेज चला जाता। किस-किस को बताता अपना कष्ट। आज उसके कष्ट की साथी वीणा थी। वीणा को देव का कष्ट अपना लगने लगा था। और वह अपने कष्ट की थाह लेने की बजाए, देव के कष्ट को दूर करना चाहती थी। देव को वह कष्ट मुक्त देखना चाहती थी।

कुछ बातें हमें सिखाई नहीं जाती। कुछ बातें हमें बताई नहीं जातीं। वे जन्म से ही हमारे साथ होती है। वही बातें हमारे संस्कार होती है। यह संस्कार पल-प्रतिपल विकसित होते है हमारे आसपास के वातावरण से। वीणा के मन में रचे-बसे संस्कार विकसित हुए थे, व्यवस्थित रुप से चलते अपने घर से - अपने माता-पिता से। अपने भावों से। यही भाव रचे बसे थे कि एक अच्छी पत्नी दुःख में सदैव अपने पति का साथ देती है। यही भाव उसे देव की सेवा में लगाए रहते थे।

देव निराश हो चुका था। उसी निराशा में आशा की किरण बनी दिखती थी उसे वीणा। अपने हर दर्द का उतर वह वीणा में ही खोजता था। आँख बन्द करके भरोसा कर रहा था वह वीणा पर। दुःख में पत्नी से बड़ा कोई मार्गदर्शक नहीं लगता व्यक्ति को। "अब क्या होगा, वीणा? जिस डॉक्टर पर भरोसा किया, उसने कुछ नहीं किया। अब वक्त गुजर चुका है। अब कुछ नहीं हो सकता।" - देव के शब्द दर्द लिए थे।

"सब ठीक हो जाएगा। चिन्ता न करो देव। हम पूरी कोशिश करेंगे।" - वीणा फिर से संभली। देव के शब्द वही थे। वही बार-बार एक ही बात दुहरा रहा था। "तुम कैसे कह सकती हो कि मैं कभी ठीक भी हो सकूँगा?" - देव जैसे आशा भरे शब्द सुनना चाहता था।

"तुम ठीक हो जाओगे। हम बड़े-से-बड़े अस्पताल में जाएँगे। हर डॉक्टर से मिलेंगे। कहीं न कहीं, कोई न कोई चमत्कार होगा। मेरी तपस्या है। ईश्वर हमारी मदद करेगा। तुम चिन्ता छोड़ दो। जीने की तमन्ना जाग्रत किए रहो।" - वीणा चाहती थी देव आशावादी रहे। और यही उसकी कोशिश थी।

अमित की अपनी दुनिया छोटी-सी होकर रह गई थी। देव के साथ यदि कही जाना नहीं होता था तो अपने काम पर जाता था, वरना काम सुपरवाईजर सतीश की देखभाल में चल रहा था। उसकी एक ही चिन्ता थी। भाई ठीक हो जाए। उसका अच्छे से अच्छा इलाज हो। वीणा को कोई कष्ट न हो। घर मे रहता या देव-वीणा के साथ किसी डॉक्टर के पास जाता या काम में व्यस्त रहता। हमेशा भाव एक ही थे उसके। पूरी तन्मयता से अपना कर्तव्य पूरा करने के। शाम को देव को ठीक पाता तो वीणा व देव के साथ कहीं घूमने चला जाता था। कभी प्रमोद आ जाता तो घर पर ही बैठकर वह बतिया लेते थे। वीणा के साथ हँसना-बातें करना, अपने मन की हर बात उससे कहना उसे अच्छा लगने लगा था। वीणा का स्वभाव देखकर वह मन ही मन उसकी पूजा करने लगा था। वीणा की हर चाह को पूरा करना उसे अच्छा लगता था। उनके साथ बाजार जाता, देखता वीणा की आँखें जहाँ कभी किसी शो-विंडो पर टिकी, जरा-सा आभास होता कि कोई चीज उसे भा गई है तो तत्काल वह चीज वीणा के लिए खरीद लेता। वीणा को अच्छा लगता था, लेकिन कभी-कभी देव से वह कहती, "अमित बहुत करता है हमारे लिए! मुझे कभी-कभी संकोच होता है।"

तब देव कहा करता, "संकोच किस बात का। मेरा छोटा भाई है। अच्छा कमाता है, और मुझसे बहुत लगाव है उसे। जब आज तक उसने मेरी हर चीज का ध्यान रखा है तो तुम्हारे लिए, कहाँ पीछे रहेगा। वह मेरा प्रिय है, उसे अपना प्रिय मानो।"

तब वीणा कुछ न कह सकी देव को। अकेले कभी सोचती तो उसे अमित के प्रति बहुत प्यार आता। उसकी मंगलकामना करती। अमित की चाहत प्रिया को अपना बनाने की है, यह वह जानती थी। उसे अमित-प्रिया की जोड़ी की कल्पना करना पसन्द था। लेकिन अब वह अपने घर वालों से या अमित से इस बात का जिक्र नहीं करती थी।

माँ को उसने देव का हाल लिख दिया था। सभी सुनकर स्तब्ध रह गए थे। लेकिन कोई कुछ न बोल पाया। वीणा ने माँ को अपनी जान की कसम दे दी थी। उसने अपने हर पत्र में देव के प्रति अपना प्यार, देव की ढेर-सी अच्छाईयों का इतना अधिक विवरण लिखा था कि वे भी देव की मंगलकामना दिन-रात करने लगे थे। उनके देव के प्रति, देव के परिवार के प्रति सारे गिले-शिकवे उन मंगलकामनाओं में दब से गए थे।

अमित भी जानता था उनके आक्रोश को। लेकिन प्रिया के प्रति जो भावनाएँ उसके मन में उमड़ी रहती थीं, उन्हें वह अपने से अलग नहीं कर पाता था। उसका मन उसके पक्ष में यही गवाही देता थी कि इस सब में उसका, उसके मन का क्या दोष? वीणा का विवाह देव से होना चाहिए था कि नहीं?

वीणा से, वीणा के परिवार वालों से यदि कोई बात छिपाई गई या नहीं, इसका उसे कोई ग्यान नहीं था। हाँ यदि शादी से पहले किसी ने उससे कुछ पूछा होता तो वह सब बात उन्हें जरुर बताता। वीणा ने ही सब बातें उसे बताई थीं। वह वीणा के भावों को अपने मन में समेटे था। जब कभी वीणा की दशा की सोचता तो बहुत परेशान हो उठता।

ऐसे में जब प्रेम रजनी की शादी की तैयारी के लिए घर जा रहा था, तब उसने ही देव के विषय में सारी बात बताई थी। प्रेम सुनकर सकते में आ गया था। वीणा से उसने अलग बैठकर बात भी की। लेकिन वीणा के मनोभाव उसके मन को छू गए थे। वह अपने बड़ी दीदी के मन को समझकर नतमस्तक हो गया था।

उसके मन में देव के प्रति उमड़ आया आक्रोश भी शान्त हो गया था। वह देव को सांत्वना देता रहा और अमित के साथ घुल-मिल गया था। अमित भी स्वयं को अपराध-भाव से मुक्त पा रहा था। इसीलिए उसका प्रेमिल मन प्रिया के विषय मे सोचने से स्वयं को नहीं रोक पा रहा था।

वह प्रिया के प्रति अपने मन में बढ़ती दिवानगी को अपनी डायरी के पन्नो में उतारता रहता था।

वीणा के नाम माँ का पत्र आया था। देव के पास बैठकर उसे पढ़ने लगी। पत्र देखकर ही बचपन से लेकर जवानी तक माँ से मिला प्यार आँखों में छलक आया। माँ ने लिखा थाः-

"मेरी प्यारी वीणा

तुम्हें माँ का आशीष!

कितनी बार सोचा तुम्हें पत्र लिखूँ, लेकिन मेरे हाथ काँपने लगते थे। कुछ समझ नही आता था, मन जैसे शून्य में जा खड़ा होता था। मेरी नन्ही-सी गुड़िया पर भगवान ने कैसे दुःखों का पहाड़ खड़ा कर दिया। देव जी पर आई विपत्ति के बारे में प्रेम से मालूम पड़ गया। मन चाहा आऊँ तुम्हारे पास। लेकिन हिम्मत मेरी जवाब दे जाती है। तुम्हारे मन के दुःख को यहीं बैठी मैं भाँप सकती हूँ। तुमने देव के प्रति अपना जीवन समर्पित कर रखा है तुम्हारी तपस्या सफल हो यही कामना करती हूँ हर दम। लेकिन मेरी कामना कब पूरी होगी, कब तुम हँसते हुई मेरे पास आओगी मैं नहीं जानती।

घर में हमारे हरदम जो हँसी छायी रहती थी, आज वहाँ चुप्पी है। देवता स्वरुप जिस पति का तुमने वरण किया उसे आज ग्रहण लगा है, ऐसा सोच कर न तो कुछ करने का मन करता है, न ही कुछ किया भी जाता है। बच्चे है सभी अपनी-अपनी पढ़ाई में व्यस्त रहते हुए भी तुम्हारी ही बात करते हैं।

डैडी जी तुम्हारे गुम-सुम अपनी पूजा-पाठ में लगे रहते है। उनकी आस्था ईश्वर पर पहले से भी अधिक हो चुकी है। जब भी तुम्हारी बात होती है यही कहते है - मैंने आज तक किसी को दुःख नही पहुँचाया। ईश्वर मेरे बच्चों का बाल-बाँका भी नही कर सकता। देख लेना, यह वीणा की परीक्षा हो रही है बस। दुःख की घड़ी जल्द ही टल जाएगी। मेरी वीणा की परीक्षा जल्द ही समाप्त हो जाएगी और उसके दुःख सब मिट जाएँगे। मेरी बच्ची जिस तरह हँसती थी, वैसे ही हँसा करेगी।

तुम पत्र जब भी लिखती हो, अपनी धुन में मग्न रहती हो। मां का हाल पूछती हो, बहनों की खबर रखती हो लेकिन अपने मन की बात कुछ नहीं कहती। बस, माँ के लिए दो ही शब्द बचे है तुम्हारे पास कि माँ मैं कुशलता से हूँ, कि माँ बस, ईश्वर से प्रार्थना करो कि मेरा देव ठीक हो जाए। कुछ तो लिखो अपने मन की बात।

तुम अपने मन की नहीं कहती। कुछ तो लिख दिया करो। माँ का मन कुछ तो हल्का पड़ जाएगा। आज ही रजनी की सास का पत्र मिला। शादी की सब तैयारी पूरी हो चुकी है। प्रेम ने यहाँ सब इन्तजाम कर लिए हैं। अब यही मेरी प्रार्थना है कि तुम और देव जी शादी से कुछ दिन पहले जरुर आ जाओ। देव जी की परेशानी मैं समझ सकती हूँ। लेकिन यह घर भी उन्ही का है। शादी की रौनक में कुछ समय के लिए वह भी कष्ट भूल जाएँगे। उनका मन भी बहल जाएगा। तुम्हारे डैडी जी भी तुम्हारे ससुर को पत्र लिख रहे हैं। मेरी तरफ से तुम सभी को न्यौता दे देना। शेष सब कुशल है। मेरी और से घर में सभी को यथा योग्य कहना। देव जी को आशिष और प्यार। उन्हें कहना हिम्मत बढ़ाए रखना।

अपने प्यार के साथ।

तुम्हारी माँ

निर्मला।"

माँ का पत्र वीणा को भावुक कर गया। आँसुओं की अविरल धारा बहने लगी। देव ने देखा, पूछा, "क्या लिखा है?"

"बस अधिक कुछ नहीं। आपका हाल पूछा है और रजनी की शादी में आने को कहा है।" अपने से छोटी रजनी का चित्र उसकी आँखों में घूम रहा था। तभी वह और अधिक भावुक हो चली थी।

सुनकर देव भी प्रसन्न मुद्रा में आ गया। बोला, "हाँ, शादी में जाना जरुरी है। कब जाना चाहोगी?"

"जब आप चलने को कहेंगे। कॉलेज से भी तो छुट्टी लेनी होगी।" - कहा वीणा ने। देव ने कुछ सोचा और कहा, "मैं जरुर जाना चाहता हूँ। पर मेरा मन नहीं मानता। ऐसी दशा में मेरा जाना उचित भी नहीं।"

"क्यों उचित नहीं? सभी को अब मालूम है तुम्हारी दशा का। व्यर्थ मत सोचो कुछ भी।" - वीणा ने उसे समझाया।

देव गम्भीर हो उठा। बोला, "दशा तो कहीं भी, कभी भी बिगड़ सकती है। और कुछ नहीं तो शादी की रौनक में दर्द हुआ तब भी सब फीका पड़ जाएगा। मै शादी की रौनक में कुछ खलल नहीं डालना चाहता। तुम जरुर जाओ। अमित तुम्हें ले जाएगा। माँ को भी साथ ले जाना।"

"ऐसा क्यों कहते हो? हर बात में अपना दुःख क्यों उजागर करते हो। दुःख को भूलना पड़ेगा हमें। जो है उसी में सुख पाने की कोशिश करो देव।" - वीणा ने उसे समझाया। वह भावुक हो चली थी। बोलती रही "मैं तुम्हारे बिना नहीं जा सकती। मेरी अकेली उपस्थिति में भी कोई वहाँ खुशी नहीं मना पाएगा। मैं भी तभी जाऊँगी, जब तुम जाओगे। वरना रजनी विदाई के बाद हमें दिल्ली में मिलती हुई चली जाएगी।"

"तुम ठीक कह रही हो, वीणा! लेकिन स्वयं सोचो। मेरी उपस्थिति में भी तो सभी की नजरें मुझ पर ही रहेंगी और सब शादी को भूलकर मुझसे ही मेरा हाल पूछते रहेंगे। मैं शादी की रौनक में बिस्तर पर लेटा तो सब फीका पड़ जाएगा। मैं ऐसे में नहीं जाना चाहता। तुम मेरी बात को समझो, वीणा! मैं तुम्हें खुशी से कह रहा हूँ। तुम जरुर जाना. मैं तुम्हारे बिना रह लूँगा।" - और यह कहकर देव की रुलाई छूट गई। वीणा ने भी निर्णय कर लिया था, अकेले न जाने का।

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