+91-11-41631787
कविता में गीता
Select any Chapter from
     
देवासुर सम्पद विभाग योग ( DEVASUR SAMPAD VIBHAG YOG )
ISBN: 81-901611-05

देवासुर सम्पद विभाग योग

'ईष्ट के वियोग

और

अनिष्ट के संयोग की आशंका,

मन में उत्पन्न करती कायरता |

भय होता प्रतिष्ठा का,

भय होता अपमान का,

रोग- मृत्यु का भय

मन में घर कर जाता |

इसका अभाव हो जिसके मन में

वह अभय कहलाता,

वही मन सात्विकता पाता |'

'अन्त:करण शुद्ध हो जिसका,

मन में हो निर्मल विचार,

राग-द्वेष-हर्ष-शोक

ममता-अहम् का सर्वथा

अभाव हो जाता,

वह परमात्मा का यथार्थ रूप

पहचानता,

उसे पाने को निरन्तर यत्न करता,

वह ज्ञान योगी होता,

वह सात्विक भाव लिए होता |'

'कर्तव्य भाव हो मन में जिसके,

निष्काम भाव से

अन्न-वस्त्र-विद्या-

अर्जित करता,

प्रेम से भूखे को

अन्न देता, वस्त्र देता,

विद्या का ज्ञान देता

वह दानशील कहलाता |

वह सात्विकता की श्रेणी पाता |'

'मन इन्द्रियों को विषयों से

दूर करता,

ईश्वर-पिता-माता

अतिथि-महात्मा-गुरुजन

की पूजा जो करता,

यज्ञ पालन जो करता,

वेद-विधान का अध्ययन करता,

ईश्वर का चिन्तन जो करता,

स्वधर्म पालन के लिए जुटा रहता,

शरीर-इन्द्रिय-और अन्त:करण में जिसके

सरलता होती,

वह शुद्ध भाव मयी होता,

वह सात्विक पुरूष होता |'

'बुरे की चाह न होती मन में,

वाणी में शुद्ध वचन होते,

शरीर से कष्ट न देता,

अपकार के बदले उपकार ही देता

क्रोध-अहम् से दूर होता,

चित्त जिसका अशांत न होता,

निन्दा भाव से दूर जो होता,

प्रायोजन बिना दया भाव होता,

आसक्ति-प्रमाद का अभाव होता,

शास्त्र-नीति युक्त रहता,

कोमलता पूर्ण व्यवहार होता,

व्यर्थ चेष्टा का अभाव होता,

वह सात्विक भाव युक्त होता |'

'श्रेष्ठ पुरूष का तेजस्वी भाव,

क्षमा-धैर्य-शुद्ध अन्त:करण,

शत्रु भाव से विरक्त,

पवित्र-व्यवहार

और सबसे ऊपर

स्वयं को पूज्य मानकर,

मान-प्रतिष्ठा की इच्छा,

अभिमान का भाव

मन में न हो जिसके,

वह दैवी-सम्पदा युक्त

पुरूष होता |'

'हे अर्जुन!

यही उत्तम पुरूष के लक्षण,

यही उत्तम पुरूष का जीवन |'

'हे पार्थ !

मान-बड़ाई-पूजा-प्रतिष्ठा का ढोंग जो करता,

ज्ञानी-महात्मा कह स्वयं को प्रसिद्ध जो करता,

अहम् भाव से युक्त वह दम्भी कहलाता |'

'विद्या-धन-कुटुम्ब,

जाति-अवस्था-बल का सम्बंध,

दूसरे को तुच्छ मान करता जो घमण्ड |

मन-इच्छा-पूर्ति का अभिमान जिसे रहता,

मन-विरुद्ध होने पर जिसे क्रोध होता,

कर्तव्य का विवेक नष्ट हो जाता,

कोमलता का मन से अभाव हो जाता,

क्षमा-दया का भाव न रहता,

हिंसा-क्रूरता-मन में कठोरता रहती,

सत्य-असत्य, धर्म-अधर्म का भाव न रहता |

अज्ञान भाव युक्त वह प्राणी

असुर स्वभाव युक्त कहलाता |'

'हे अर्जुन !

तू शोक न कर |

तू दैवी-सम्पदा युक्त भाव लिए जन्मा |

यह दैवी-सम्पदा मुक्ति दिलवाती |

आसुरी-सम्पदा युक्त मानव

बन्धन में इस संसार के बँधा रहता |

न छूटना चाहता, न छूटने का यत्न करता |'

'हे अर्जुन !

सृष्टि में दैवी-सम्पदा युक्त प्राणी भी,

सृष्टि में आसुरी-सम्पदा युक्त प्राणी भी |

दैवी-सम्पदा शुद्ध-सात्विकतामयी |

आसुरी सम्पदा की माया अब मैं तुझको

सुनाता हूँ |'

'एक ही धर्म मनुष्य मात्र का,

लोकहित कर्म में प्रवृत्त रहने का |

सदा-सर्वदा अकर्मव्यता से

निवृत्त रहने का |'

'आसुरी स्वभाव

न प्रवृत्ति रखता कर्म की,

न निवृत्ति भाव भी मन में रखता

न भीतर-बाहर की शुद्धि रखता,

न शुद्ध आचरण होता

और न सत्य भाषण ही होता |

वह मिथ्याचारी होता,

वह दुराचारी होता |'

'वह जगत को आश्रय रहित कहता,

न ईश्वर आधार, न सत्य |

यह जीव स्त्री-पुरूष के संयोग से जन्मा,

'काम' ही इसका कारण

नहीं और कोई प्रयोजन |'

'नास्तिक भाव लिए मानव,

आत्मा की सत्ता न स्वीकारे |

वह केवल इस देह की सत्ता स्वीकारे |

इस मिथ्या ज्ञान को ज्ञान माने |

इसे जीवन का आधार माने |'

'वह भौतिक जगत

में ही सुख खोजता,

स्वभाव सरलता खो देता,

मन्द बुद्धि से निश्चय होता,

भोग-सुख ही लक्ष्य होता |

अपने हित में

सब कर्म करते |

लोकहित नहीं अहित का सोचे |

उपकार नहीं अपकार की सोचे |'

'समस्त कर्म में अहम् महान |

मन-बुद्धि का एक ही कर्म,

विनाश हो जाए

चाहे जगत का,

पूरे हो जाए सब मेरे

काम |

वह स्वयं को पूज्य माने,

धन-मान-प्रतिष्ठा ही श्रेष्ठ माने |

रूप-गुण-जाति

के नशे में चूर

स्वयं को श्रेष्ठ माने |'

'इच्छा- आकाँक्षा उसकी असीम,

मिथ्या-भाव में वह जीता,

भ्रष्ट-आचरण ग्रहण किए,

वह इच्छापूर्ति में रत रहता |

वह चिन्ता मग्न रहता |

उसे सदा 'कल' की चिन्ता रहती |

वह विषय-भोग में रत रहता |

वह विषय-संग्रह में रत रहता |

'और अधिक सुख' की इच्छा रहती,

जो सुख मिला, वह भोगता

पर कभी आनन्द न पाता |'

'जीवन तो उसका कल की चिन्ता में डूबा रहता |

अपना आज तो बीत जाता,

मृत्यु-पर्यन्त तक चिन्ता रहती,

कब क्या होगा, कैसे होगा ?

कौन मेरे साथ होगा ?

मेरे इस सुख-संग्रह का क्या होगा ?

वह कल्पनाओं में जीता,

वह आशाओं के दीप जलाए रहता |

वह एक आशा से दूसरी |

दूसरी से तीसरी

असंख्य आशाओं के बन्धन में

फँस जाता |

विषय-भोग में काम-क्रोध

का आश्रय होता |

धन-संग्रह की चिन्ता रहती,

न्याय-अन्याय

हित-अहित

किसी ओर का नहीं,

बस अपना न्याय,

और अपना हित,

जीवन का लक्ष्य होता |'

'हर क्षण एक ही

मान रहता |

आज यह पा लिया,

अब यह भी मैं

पा लूंगा |

एक इच्छा पूर्ण हुई,

मेरे पुरूषार्थ से ही

पूर्ण हुई,

अब मैं दूसरी पाने का यत्न करूँगा |

अब इतना धन संग्रह कर लिया,

कल इतना मैं कर लूँगा |

पल-प्रतिपल मैं आगे बढूँगा ,

ऊपर उठूँगा |

हर इच्छा- आकाँक्षा की पूर्ति करूँगा |'

'वह शत्रु मेरा, मैंने उसे परास्त किया |

मैं अपने हर शत्रु का नाश करूँगा |

जो मेरी राह में आएगा,

जो मेरे ऐश्वर्य को घटाएगा

मैं उसका नाश करूँगा |

मैं ही ईश्वर हूँ ,

मैं ही नियन्ता |

मैं सुख-साधन जुटाता,

मैं ही इसे भोगता |

मैं सब सिद्धियों का ज्ञाता,

मैं बलवान

मैं ही सुख-प्रदाता |

मैं धनी बहुत,

मित्र-बन्धु-कुटुम्ब मेरा

है बहुत बड़ा |

मेरी एक आवाज पर

विश्व खड़ा |

मैं प्रसन्न तो यज्ञ करूँगा |

सुख कामना में मौज करूँगा |

जो मेरा हित करेगा,मैं उसे दान दूँगा |

मैं आनन्द लूँगा ,

मैं जीवन-पर्यन्त अब मौज करूँगा |'

'यह अज्ञान-जनित मोह,

यह जाल उसे बाँधे रहता |

विविध विषयों में चित्त

भटका रहता |

वह इस मोहजाल में फँसा रहता |

विषय भोग जीवन का ध्येय,

वह इच्छा-पूर्ति के मद में फँसा रहता |

वह आसक्ति में डूबा रहता,

वह दम्भ-मद-काम-क्रोध का साथी रहता,

ऐसा असुर स्वभाव अपवित्र भाव लिए

नरक का वासी होता |

वह परम सुख से परे होता,

वह जीवन पर्यन्त भटकता रहता |'

'मैं यज्ञ करूँगा,

मैं दान दूँगा |

मैं दानी बड़ा सबसे,

मैं महायज्ञ हूँ करवाता |'

यह भाव दम्भ से प्रेरित |

यह भाव स्वयं को सर्वोपरि, श्रेष्ठ मानने वाले

मद-आसक्ति में डूबे,

धन-मान के गर्व में डूबे,

आसुरी-सम्पदा युक्त प्राणी के |'

'नाम-दर्शन में यज्ञों का प्रतिपादन करते,

नाम की महिमा में शास्त्र विधि रहित

पूरे ढोंग से यज्ञ का आयोजन करते |

वे तामस-यज्ञ कहलाते,

वह ईश्वर-भक्ति के लिए नहीं,

स्वार्थ-सिद्धि के निमित्त होते,

जग में अपनी प्रतिष्ठा हेतु होते |'

'आसुरी सम्पदा युक्त पुरूष

अहंकार में डूबे,

बल-कामना-

मद-काम-क्रोध से प्रेरित

दूसरों में केवल दोष खोजते,

दूसरों के गुणों का खण्डन करते,

दूसरों की निन्दा करते,

औरों की बात क्या

वह सन्त-महात्मा के निन्दक होते,

ईश्वर में भी दोष ढूँढते |'

'द्वेष भाव से युक्त

ये प्राणी पापाचारी कहलाते,

ये क्रूर कर्मी कहलाते |

वे बार-बार जन्म लेते,

बद से बदतर योनियों में

बार-बार जन्म लेते |

मोह-काम-क्रोध-लोभ

के वश में रहते |

ये काम-क्रोध और लोभ भाव,

आत्मा को अन्धकारमयी बनाते,

उसे मूढ़ योनि मे ढकेलते

जीवन को दुख:मयी बनाते |'

'सारे अनर्थो

के मूलभूत

काम-क्रोध-लोभ ही

समस्त अधोगति का कारण हैं |

इन्हे त्याग दो,

इन्हे त्यागना ही

जीवन की दुर्दशा

का निवारण है |

हे अर्जुन!

इन तीनों नरक के द्वारों से

मुक्त पुरूष,

अपने कल्याण हेतु करता आचरण |

वह परम गति को पाता|

वह मुझे प्राप्त हो जाता |

वह दैवी सम्पदा युक्त होकर

इस जीवन से मुक्ति पा लेता |'

'जो पुरूष शास्त्रविधि का त्याग करते,

मनमाना आचरण करते

वह न सिद्धि पाते,

न सुख पाते,

न शाँति कहीं मिल पाती

वह परम गति नहीं

अधोगति के भोगी बनते |'

'हे अर्जुन !

तू शास्त्र-सम्मत हो कर्म कर |

यह शास्त्र कर्तव्य का भेद बतलाते,

यह शास्त्र ही कर्म का निर्धारण करते |

तू निष्काम भाव से कर्म कर |

हे अर्जुन!

निष्काम कर्म ही शुभ कर्मों का हेतु होता

वही ईश्वर प्राप्ति का साधन होता |'