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शरीर व आत्मा विभाग योग ( SHARIR AUR ATMA VIBHAG YOG )
ISBN: 81-901611-05

शरीर व आत्मा विभाग योग

शरीर

और

आत्मा

परस्पर अत्यन्त विलक्षण |

शरीर-जड़-विकारी-क्षणिक-नाशवान,

आत्मा-चेतन-निर्विकार-नित्य

अविनाशी और ज्ञानवान |'

'शरीर दृश्य है,

प्रतिक्षण इसका क्षय होता है |

आत्मा दृष्टा है

मन-बुद्धि-इन्द्रिय के

विषयों का ज्ञाता है |

तत्व ज्ञानी इस आत्म तत्व को जानते हैं,

वे शरीर को इससे विलग मानते हैं |'

'हे अर्जुन!

आत्मा-परमात्मा में भेद न मान,

आत्मा को तू मेरा ही अंश मान |

इस शरीर को हर कोई जान सकता,

यह उत्पन्न होता, नष्ट होता,

अनित्य और क्षणिक है |

जबकि आत्मा अत्यन्त विलक्षण,

नित्य-निर्विकार-शुद्ध व चेतन,

यह रूप नहीं बदलता |

अज्ञान ही एकत्व का बोध कराता |'

'आत्मतत्व को पहचान,

यह विलक्षणता ही

है वास्तविक ज्ञान |

यह मत मेरा मान |

आत्मा को शरीर से

सदैव विलग मान |'

'यह शरीर क्या है?

कैसा है ?

किन विकारों वाला है?

और

इस आत्मा के क्या हैं लक्षण?

कैसा प्रभाव?

यह भेद तुझे समझाता हूँ |

पूर्ण ज्ञान से संसार भ्रम का नाश हो जाएगा |

तुझे परमात्मा प्राप्ति का मार्ग

और स्पष्ट नजर आएगा |'

'मन्त्रों के दृष्टा,

शास्त्र-स्मृतियों के रचियता,

समस्त ऋषियों ने,

पुराण-ग्रन्थों में,

वेद मन्त्रों में,

क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ के तत्व की

विविध रूप से व्याख्या की है |

यह निश्चित भाव तुझे

मैं युक्तिपूर्वक

संक्षेप में सुनाता हूँ |'

'पृथ्वी-जल-अग्नि-वायु और आकाश,

इन पांच महाभूतों,

अहंभाव,

बुद्धि,

मूल प्रकृति,

और

वाक-हाथ-पैर-अपस्थ-गुदा,

और

श्रोत्र-त्वचा-चक्षु-रसना-ध्राण

इन दस इन्द्रियों,

और एक मन

और इन्द्रियों के पांचों विषय

यानि

शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गन्ध

तथा

इच्छा-द्वेष-सुख-दु:ख,

स्थूल शरीर का पिण्ड़,

चेतना और

धारण शक्ति,

यही इस शरीर के समस्त विकार,

और

यही संक्षेप में इस शरीर का वर्णन |'

'अब ज्ञान तत्व को जान,

ज्ञान पाने का साधन जान |

स्वयं को श्रेष्ठ समझना,

पूज्य मानना,

मान-प्रतिष्ठा-पूजा की इच्छा करना,

यह मानित्व कहलाता |'

'इस श्रेष्ठता के अभिमान का अभाव,

जिसे इस भाव की अपेक्षा न रहे,

विरक्त हो जाए जो ऐसी आशा से

वह ज्ञान का योग पाए |'

'मान-प्रतिष्ठा-पूजा या

धन लोभ से

जो स्वयं को

धर्मात्मा-दानशील-ईश्वर भक्त-ज्ञानी

कह कर विख्यात करे,

धर्मपालन, भक्ति, योगसाधन,

व्रत-उपवास का ढोंग कर

प्रचार करे,

वह पुरुष दम्भी कहलाए |'

'जो अपने, ईश्वरीय तत्व के

भावों से

ज्ञान का प्रचार करे,

अपने ज्ञान की बीन न बजाए

वह इस दम्भाचरण से विरक्त हुआ

ज्ञानी कहलाए |

जो किसी भी प्राणी को

मन-वणी या शरीर से

कष्ट न दे,

मन से बुरा न चाहे,

कठोर वचन न कहे,

निन्दा-स्तुति न करे,

वह प्राणी अहिंसा का योगी,

सदा-सर्वदा

द्वेष-वैर से दूर रहे,

ऐसे की संगत पाकर

हिंसक प्राणी भी वैर भाव से

दूर हो जाए |

ऐसा मन ज्ञानवान ही पाए |'

'अपराधी को

दण्ड देने का भाव

मन में न रखे जो,

बस अपराधों से

प्राणी को मुक्त कराने

का ध्येय हो जिसका,

वह क्षमा भाव युक्त ज्ञानी

ज्ञान सिद्ध हो जाए |'

'साधक जो सरल-चित व्यावहार करे,

दांव-पेच-कपट-कुटिला का स्वयं में

अभाव कर पाए,

सहज-सरल-शांत चित्त प्राणी

मन-वाणी से निर्मल हो जाए |'

'विद्या-उपदेश ग्रहण कर

श्रद्धा से,

भक्ति से

गुरु का आदर करे |

वह गुरु भक्त सहज

ज्ञान का सधन पा जाए |'

'सत्यतापूर्वक शुद्धा व्यवहार से

द्रव्य की शुद्धि होती है |

ऐसे द्रव्य से ही बने अन्न से

आहार की शुद्धि होती होती है |

यथायोग्य शुद्ध व्यवहार से

आचरण की शुद्धि होती है |

जल व मिट्टी से

शरीर की शुद्धि होती है |

यह सब बाहर की शुद्धि है |'

'भीतर अन्त:करण से

छल-कपट

राग-द्वेष से रहित होकर

स्वच्छ मन ध्यान लगाना,

भीतर की शुद्धि कहलाता |'

'यह भीतर-बाहर की शुद्धि

प्राणी को ज्ञान भाव ही करवाता |

कष्ट-विपत्ति,

भय-दु:ख आ जाने पर भी

जो प्राणी न होता विचलित |

भय-लोभ-काम-क्रोध के

वश में होकर,

जो कर्तव्य कर्म से कभी न डिगता

उसका अन्त:करण स्थिर होता |

वह ज्ञान का ही भाव होता |'

'जो मन-इन्द्रियों को वश में

कर लेता,

वह विषय-विकारों में नहीं फंसता,

मन उसके अनुकूल कर्म में

लग जाता,

उसका आज्ञाकारी बन जाता |'

'इस लोक-परलोक के

शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गन्ध रूप

सब विषय पदार्थों

से जब प्राणी आसक्ति का अभाव कर पाता,

देहाभिमान का सर्वथा अभाव कर पाता |'

'जन्म-मृत्यु

जरा-रोग सब दु:खदायी |

इसे सहज भाव में स्मरण कर जो

वैराग्य भाव उपस्थित रखे,

पुत्र-स्त्री, घर-धन में

आसक्ति का अभाव करे जो,

ममता का अभाव करे जो,

प्रिय-अप्रिय की प्राप्ति में सम रहे,

वह ज्ञान भाव से युक्त रहे |'

'ईश्वर से जो अनन्य भक्ति भाव रखे |

स्वार्थ-अभिमान-ममत्व का भाव न हो

भक्ति में,

ईश्वर का भाव सदा मन से रहे |

निर्मल-पवित्र-एकान्त भाव में,

व्यर्थ के शोर से

दूर रहे ।

प्रमाद और विषयासक्त

पुरुषों से

विरक्ति भाव रखे,

आध्यात्म ज्ञान में

मन स्थापित करे

और

तत्व ज्ञान का

अर्थ

ईश्वर का रूप ही माने,

वह ज्ञानवान कहलाए |'

'वही ज्ञान की राह

जाने,

वही ईश्वर का भाव

समझ पाए |

इसके विपरीत सभी

अज्ञान रूप अन्धकारमयी हो |'

'अब ज्ञान से जानने योग्य

परमात्मा का स्वरूप समझ |

परब्रह्म परमात्मा के ज्ञान से

मनुष्य इस जन्म-मरण के बन्धन से,

इस संसार बन्धन से मुक्त हो जाता |

वह परम पद पाकर

परब्रह्म में लीन हो जाता |'

'प्रकृति यह सारी

और जीवात्मा यह अनादि है |

इसका स्वामी परब्रह्म पुरुषोत्तम

अनादि वाला ।

प्रमाणों से सिद्ध जो हो सकता

वही 'सत्' कहलाता |

परमात्मा ही प्रमाण को सिद्ध करता,

वह इस 'सत्' सिद्धि से विलक्षण होता |'

'जिस वस्तु का अस्तित्व नहीं

वही 'असत्' कहलाती |

'वह' अवश्य है और वह है

तभी सबका होना सिद्ध होता |

ऐसे में परमात्मा इस 'सत्'

'असत्' के निरूपण से तटस्थ रहता |

वह सत् होकर भी सत् से तटस्थ रहता |'

'परब्रह्म परमात्मा

समग्र भाव युक्त होकर भी

अति सूक्ष्म भाव में रहता |

समग्र सृष्टि में हाथ-पैर फैलाए,

सब ओर नेत्र-सिर-मुख धारण किए,

सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड है उसका ध्वनि क्षेत्र |'

'यह ज्ञेय स्वरूप परमात्मा

समस्त जगत का कारण,

सब कुछ व्याप्त है इसमें |

स्थित है जड़ में,

चेतन में,

तभी सब व्याप्त है उसमें

तभी सब परिपूर्ण है |'

'वह समग्र भाव युक्त

सब इन्द्रियों के विषयों को जानकर भी

मन-विषयों से विरक्त रहता |

वह आसक्ति रहित होकर

सब का भरण-पोषण करता |

बिना ही करण हित करता |'

'प्रकृति से सम्बन्ध है

तभी समस्त गुणों का

भोक्ता दिखता,

पर वह लिप्त नहीं होता |'

'वह आलौकिक

निर्गुण भाव लिए रहता |

समस्त जगत में,

समस्त प्राणियों में

बाहर-भीतर

वह ज्ञेय स्वरूप परमात्मा

है व्याप्त |'

चर में वही,

अचर में वही |

समुद्र में जैसे जल,

जल में पड़ी बर्फ,

बाहर भी जल

भीतर बर्फ के जल |

अन्दर जल,

बाहर जल,

चारों ओर जल ही जल |

ज्ञेय का स्वरूप जानकर भी

जान नहीं पाते प्राणी,

अति समीप वही,

अति दूर वही स्थित लगता |

अति सूक्ष्म भाव युक्त

वह जानने में नहीं आता |

श्रद्धा से वह मन में स्थित होता |

श्रद्धा नहीं तो दूर-दूर तक नहीं दिखता |

एक नहीं

अनेकता दिखती,

आत्मा नए-नए रूप में दिखती |

सम्पूर्ण जगत एक सूत्र में बंधा,

हर प्राणी का भिन्न रूप रचा |

ब्रह्मा रूप से जग को रचता |

विष्णु रूप से पालन करता |

रुद्र रूप से करे संहार |

ब्रह्मा यही, विष्णु भी यही

शिव का रूप है यह संसार |

देखो! देखो! रूप अनेक,

ईश्वर के नित नये स्वरूप |

ब्रह्म एक है फिर भी मेरा,

वही सर्वत्र, वही अनेकों का एक |

उसे सूर्य प्रकाशित न करता,

न चन्द्र रोशनी देता है |

तारों की भी ज्योति नहीं

विद्युत भी प्रकाश न दे

अग्नि की फिर बात है क्या!

वह तो सूर्य का तेज स्वयं है,

अग्नि-चन्द्र में स्वयं स्थित है |

जो सबको ही ज्योति देता,

वह स्वयं प्रकाश-पुन्ज

तम-अज्ञान

नहीं टिक सकते,

वे उन सबसे परे है |

इस ज्ञेय को जानो

और पहचानो,

यह चेतन

यह बोधमयी है |

ईश्वर मेरा

परम कर्तव्य,

यही जानने योग्य भाव है |

अभ्यास भाव से

जुटे रहो

ज्ञान के सब साधन अपनाओ,

तत्व ज्ञान से यह मिल सकता |

तत्व ज्ञान का योग पाओ,

तत्व ज्ञान से ईश्वर पा जाओ |

मन में ईश्वर

स्थित है सबके |

पलक झपकते

वह प्रत्यक्ष है दिखता |

ईश्वर यूँ तो कण-कण में दिखता,

प्रेम से देखो

प्रत्यक्ष खड़ा है |

कभी बांसुरी बजाता,

कभी प्रेम रस देता

मन में सबके वही मुस्काता |

मन में सबके रस बरसाता |

प्रेम से मन में वही खड़ा है |

यही भाव हैं इस शरीर के,

यही ज्ञान है

यही विज्ञान |

ईश्वर का स्वरूप समझ ले,

मेरी भक्ति से शक्ति पा ले,

ईश्वर के तू तत्व को जान |

'देख! तू मुझको

स्वयं पा लेगा |

देख! तू मेरा स्वरूप बनेगा |'

'हे पार्थ!

इस महाब्रह्म को अनादि जान |

जीव का जीवन अनादि सिद्ध है |'

'राग-द्वेष

मोह-माया-दम्भ,

सत्-रज-तम

त्रिगुणात्मक भाव,

सभी प्रकट हैं

प्रकृति से |

अग्नि-आकाश-वायु-जल-पृथ्वी,

शब्द-रूप-स्पर्श-रस-गन्ध

ये सब तत्व प्रकृति जनित हैं |'

'दसों इन्द्रियां, बुद्धि-अहम्

और चंचल मन,

सभी भाव प्रकृति से उत्पन्न |

मानव यह तो निमित्त बना है,

सुख-दु:ख के भाव को दर्शाए |

प्रकृति में वह स्थित हुआ,

प्रकृति जनित भावों को भोगे |'

'सत्-रज-तम का

अनादि-सिद्ध सम्बन्ध,

जैसी जिसकी प्रबल भावना,

जैसा जिसका आसक्ति से

सम्बन्ध,

वैसे भाव हो,

वैसा ही जन्म |'

'जड़ शरीर में चेतनता लाए,

देह में स्थित जब आत्मा हो जाए |

इसे प्रभु का अंश ही मानो |

यही प्रकृति में जीवन लाए |

विलग नहीं हो सकती जानो

आत्मा उस परमात्मा से |

यही साक्षी, यही यथार्थ,

यही अनुमन्ता, यही है भर्ता |'

यही भोगती जीव रूप में,

यही ब्रह्मा की स्वामी ईश्वर,

यही महेश्वर, यही गुणातीत,

शुद्ध सच्चिदानन्दन ब्रह्म यही है |

यही मेरे मन में स्थित आत्मा है,

यही परब्रह्म परमात्मा है |

जो इस भाव को तत्व से जाने,

वह ईश्वर का रूप पहचाने ।

गुण-भाव से प्रकृति समझे,

स्वयं को स्वयं पहचाने

कर्तव्य कर्म में जुटा रहे,

पुन: जन्म धर लौट न आए ।

उसका उद्धार यही आत्मज्ञान करवाए ।

'यह आत्मा विलक्षण,

परमात्मा विलक्षण है |

शुद्ध बुद्धि और

सूक्ष्म ध्यान से,

स्थित हृदय दिखे

योगी को ध्यान से |

यह ज्ञान भाव से

मिलता ज्ञानी को

कर्म भाव से |

कर्म योगी को |

शुद्ध भाव से मिले सभी को |'

'सरल भाव से

सरल उपाय |

ईश्वर सरल है

सरल स्वरूप |

मन्द बुद्धि हो,

भाव न समझे जो |

तत्व ज्ञान का ज्ञान न हो |

शरण ज्ञानी के

जाकर जो,

ईश उपासना की चेष्टा करे,

ईश भाव मन में रखे,

प्रेम से 'उसका' श्रवण करे |

वह भी सरल भाव से

'उसे' प्राप्त हो |

भव-सागर से

तर जाए वो |

ईश्वर उसे भी मिल जाए |'

'हे अर्जुन!

यह चराचर प्राणी लेता

शरीर आत्मा के

संयोग से जन्म |

ज्ञानी पुरुष

विनाशशील माने इस शरीर को |

आत्मा का धर्म नित्य-अविनाशी माने |

वह ईश्वर को नाश रहित-चेतन और

समभाव युक्त माने,

वह इस जीवन के यथार्थ को पहचाने |'

'प्राणी जो समभाव रखे,

अभिन्न माने आत्मा को परमात्मा से |

स्थूल शरीर से विलग माने स्वयं को,

अभिन्न भाव से मिल जाए परमात्मा से |

वह विनाश न पाए, वह परम गति ही पाए |'

'आत्मा में

कर्तापन का अभाव करे जो |

इन्द्रियों को इन्द्रियों के

विषय बरतते माने,

गुणों को गुणों में

बरतता माने,

गुणों द्वारा समस्त

कर्म होते माने,

प्रकृति ही कर्मों को

जन्म देती,

प्रकृति ही स्वयं कर्म करती |

यह आत्मा अकर्ता है |

यह शुद्ध-मुक्त

नित्य-विकार रहित,

यही जीवन का

यथार्थ है

यही भाव को वह

यथार्थ मानता |

जिस क्षण अहम् भाव

समझ आ जाता,

जिस क्षण एकीभाव समझ आ जाता |

जैसे ही समभाव स्थापित होता,

मन में आत्मभाव जाग्रत हो उठता |'

'परमात्मा एक,

पृथक-पृथक स्थित प्राणियों में

आत्मा भी पृथक नहीं,

वही एक है,

उसी एकता से ही अनेकता होती है,

वही एक ब्रह्म है |

वह क्षण बहुत विलक्षण होता |

प्राणी ब्रह्म को पा लेता,

वह ब्रह्म भाव ही हो जाता |'

'हे अर्जुन!

शरीर में स्थित यह परमात्मा

अनादि है,

यह सदा ही व्याप्त है,

प्रकृति और गुणों से जो परे है |

यह निर्गुण रूप

वास्तव में विरक्त है |

कहीं लिप्त नहीं, निर्लिप्त है |'

'जैसे आकाश व्याप्त है

सर्वत्र वायु-अग्नि-जल-पृथ्वी में,

समभाव युक्त होकर भी

गुण-दोषों में

लिप्त नहीं होता |

वैसे ही यह आत्मा है |

सर्वत्र स्थित है,

अति सूक्ष्म भाव में,

पर मन-बुद्धि-इन्द्रिय-शरीर के

गुण-दोषों से लिप्त नहीं |'

'हे अर्जुन!

एक ही सूर्य

इस ब्रह्माण्ड को प्रकाशित किए है,

उसी तरह यह एक विलक्षण आत्मा

इस समस्त जड़ वर्ग को प्रकाशित किए है |

यही सबको सत्ता-स्फूर्ति देती है |

भिन्न-भिन्न भाव में प्रकट होती है |'

'हे अर्जुन!

इस शरीर को

इस आत्मा को

इनके भेद को

इनके विलक्षण भाव को,

जो पुरुष

ज्ञान-नेत्र से

तत्व भाव से

जान लेता |

जो इस आत्मा को

चेतन, निर्विकार,

अकर्ता-नित्य

अविनाशी-ज्ञान स्वरूप

मान लेता,

वह महात्मा बन जाता,

वह परम ब्रह्म

परमात्मा को प्राप्त होता |'