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कविता में गीता
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विश्वरूप दर्शन योग ( VISHWAROOP DARSHAN YOG )
ISBN: 81-901611-05

विश्वरूप दर्शन योग

अलौकिक भाव सुनकर

अर्जुन कृतज्ञता से बोला

'कृतज्ञ हूँ आपका

जो मेरा अनुग्रह स्वीकार किया |

मैं योग्य नहीं था

फिर भी परम् गोपनीय ज्ञान कहा |

अज्ञान मेरा अब दूर हुआ

ईश्वर का रूप मैं जान गया |'

'हे कमलनेत्र !

प्राणी की उत्पत्ति-प्रलय का भाव

मैं जान गया,

मैं जान गया अविनाशी महिमा को |

हे परमेश्वर |

आप सर्वसमर्थवान हैं |

शक्ति-बल-वीर्य-तेजयुक्त,

असीम-अनन्त ज्ञानवान हैं |'

'सुना, समझा

अब इच्छा है इस विराट रूप को

देखने की |

हे प्रभो!

प्रबल लालसा मेरे मन की

शांत करो |

हे योगेश्वर !

अपने सामर्थ्य से अधिकार दो,

अविनाशी रूप के दर्शन दो |

परम श्रद्धलु,

परम प्रेमी अर्जुन

के सुनकर वचन,

श्री भगवान बोले

'हे पार्थ!

उठो! चलो, देखो

मेरे असंख्य रूपों का दर्शन देखो!

देव-मनुष्यों की भिन्न-भिन्न

आकृतियां देखो!

एकता में अनेकता देखो !

भिन्न-भिन्न रूपों में एकरसता देखो !

जाति-वर्णो के विभिन्न

रूप देखो !'

'देखो! मेरे नए-नए रूप देखो !

असंख्य भाव हैं मेरे,

पर सबमें एक भाव देखो!

मेरे रूप अनेक,

मेरे कर्म अनेक

पर फिर भी मैं एक!

इस आलौकिक रूप को देखो!

हे भरतवंशी अर्जुन!

मेरे रूपों में सब विराजमान |

मेरे रूपों में देव-ऋषि-मुनि

सब विद्यामान |’

'अदिति पुत्र द्वादश,

आठ वसु

और रुद्र एकादश सब विद्यमान |

दोनों अश्विनी कुमारों को देख |

आश्चर्यमयी उन्चास वायु देवताओं

को देख !

संशय रहित होकर

देख ! सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को देख!

जो कुछ देखने की इच्छा है,

उसे मेरे समग्र रूप में देख!'

'भूत-भविष्य और वर्तमान,

मेरे रूप में सब हैं विद्यमान!

क्या रुप है ईश्वर का!

क्या भाव है ईश्वर के!

हम ईश्वर को सर्वत्र देखकर भी,

नहीं देख सकते!

हम जानकर भी ईश्वर को

नहीं जान पाते!

भाव बहुत सरल है

पर इन्हें कठिन समझते!

एक ईश्वर है,

अंश बहुत हैं विद्यमान!'

'एक ईश्वर,

नित नए रूप रचे, रचे नित नए विधान ।

हर भाव ईश्वर है,

हर रूप ईश्वर है,

ईश्वर समझने की बात है,

ईश्वर जानने की बात है

ईश्वर स्वयं होकर भी

नहीं होता विद्यमान |'

विरक्त है,

निर्लिप्त है,

फिर भी वही मेरा ईश्वर है!

'हे अर्जुन!

योगशक्ति से ही

तू मेरा रूप समझ पाएगा,

दिव्य नेत्रों से ही

तू मेरा रूप देख पाएगा |

यह दिव्य दृष्टि मैं तुझे

प्रदान हूँ करता,

यही तुझे ईश्वरीय योगशक्ति

को प्रत्यक्ष दिखाएगी |

यही दिव्य दृष्टि

तुझे ज्ञान का भण्डार प्रत्यक्ष दिखाएगी |'

युद्ध में हो रही

इस लीला को संजय देख रहा था |

राजा धृतराष्ट्र को

सब वृतान्त कह रहा था |

बोला संजय-'हे राजन!

श्री कृंष्ण हैं स्वयं ही दिव्य पुरुष

वे ही हैं परमेश्वर |

परम ज्ञानी, परम योगी,

पापों का नाश करने वाले ,

दु:खों को हरने वाले,

अर्जुन क्या,

मैं भी कृतार्थ हो उठा,

ईश्वर के अलौकिक-दिव्य तेजमय

रूप का दर्शन पा लिया |'

'एक रूप

में दिखते हैं रूप अनेक!

मुखमण्डल ऐसा कि

असंख्य मुखों-सा होता प्रतीत!

नेत्र एक सूर्य सदृश,

नेत्र एक चन्द्र सा,

अनेक नेत्र, नेत्रों में दिखते!

दिव्य दर्शन,

हर क्षण नया परिवर्तन!

विराट भाव के अद्भुत दर्शन!

दिव्य भूषणों से सजे हुए,

दिव्य मालएँ धारण किए,

वस्त्रों का है कठिन वर्णन

दिव्य गन्ध का लेप किए,

शस्त्र अनेकों धारण किए,

विराट रूप में, सर्वत्र दृष्टिगत

श्री कृष्ण हुए !'

'हजारों सूर्य एक साथ

नहीं कर सकते ऐसा दिव्य प्रकाश!

अनित्य-भौतिक-सीमित हैं सब प्रकाश पुन्ज,

ईश्वर का स्वरूप

नित्य-अलौकिक-दिव्य-अपरिमित

प्रकाशमयी!'

'हे राजन!

पाण्डु पुत्र अर्जुन ने

सम्पूर्ण विश्व रूप को,

एक साथ,

पृथक-पृथक रूप में

देवों के देव श्री कृष्ण भगवान

के रूप में स्थित देखा!

यह विराट रूप आश्चर्यमयी!'

अर्जुन आश्चर्य युक्त हुआ,

समस्त शरीर पुलकित हो उठा |

श्रद्धा-भक्ति से नतमस्तक

होकर, कृतज्ञ भाव युक्त वचन वह

बोला,

'हे देव!

आश्चर्य चकित

सम्पूर्ण विश्व मैं देख रहा!

एक रूप में अनेक रूप मैं देख रहा!

सभी प्राणियों को एक साथ,

सभी देवताओं को आत्मसात

किए देख रहा!'

'कमल पर बैठे ब्रह्मा को,

महादेव, ऋषियों को,

दिव्य रूप सभी,

प्राणी-पशु-पक्षी

और दिव्य सर्पों को भी देख रहा!'

'हे सम्पूर्ण विश्व के स्वामी!

अनन्त रूप हैं,

असंख्य बाहु-पेट-भुजा-मुख,

नेत्र अनेक मैं देख रहा |

विराट रूप ऐसा कि

आदि नहीं, मध्य नहीं

न अन्त कहीं दिखता है!'

'कहीं मुकुट धारण किए,

कहीं गदा युक्त,

कहीं चक्र सुदर्शन हाथ लिए!'

'प्रकाश मान तेज के पुन्ज बने,

अग्नि से प्रज्ज्वलित,

सूर्य सदृश ज्योति युक्त हो!

निकट होकर भी,

लगता है बहुत दूर हो!

दूर दिखते हो

मगर लगता है मेरे भीतर भी

तुम हो!

मेरे आगे भी तुम हो,

मेरे पीछे भी तुम हो,

जिधर देखता हूं

तुम ही तुम हो!

यह प्रेम भाव मेरा

अतुलनीय है!

रूप तुम्हारा अतुलनीय है!'

'हे परमेश्वर!

एक ओंकार तुम्हीं हो

तुम परमब्रह्म परमात्मा हो!

परम आश्रय जगत के हो,

अनादि धर्म के रक्षक हो!

अविनाशी तुम,

तुम्ही सनातन पुरुष हो!'

'विराट रूप है आपका,

असीम भाव में सब कुछ समाया |

उत्पत्ति,

स्थिति वृद्धि-क्षय-परिणाम

और विनाश रूप

के विकारों से रहित हो!

बल-वीर्य-सामर्थ्य-तेज

की सीमा नहीं कोई,

जिधर देखता हूं

अनन्त भुजाएं लिए खड़े हो!

असंख्य मुख,

चन्द्र-सूर्य सम नेत्र हैं दिखते!

प्रज्ज्वलित अग्नि-सा प्रकाश

और तेज युक्त सारा विश्व है दिखता!'

'हे महात्मन!

विस्तृत रूप में सभी दिशाएं

स्वर्ग लोक-पृथ्वी की सीमाएं

सभी व्याप्त दिखती हैं |

यह अद्भुत और उग्र रूप ऐसा

कि स्वर्ग-मृत्यु और अन्तरिक्ष

में स्थित सब जीव व्यथित से दिखते हैं!'

'देव समुदाय सभी

आपके विराट रूप में उपस्थित हैं!

कुछ भयभीत हुए,

कुछ जोड़े हाथ,

नाम-गुण की महिमा करते!

महर्षि-सिद्ध योगी सभी

कल्याण मयी भावों से

स्तुति आपकी करते दिखते |

विस्मित भाव से देख रहे,

रुद्र ग्यारह और बारह आदित्य,

आठ वसु और साध्य देव सभी!'

'रूप आपका, महिमा ऐसी,

अद्भुत भाव से आश्चर्यचकित है,

विश्वदेव, अश्विनीकुमार,

वासुदेव, पितर समुदाय,

गन्धर्व-यज्ञ-राक्षस और सिद्धों के समुदाय!'

'हे महाबाहो!

असंख्य मुख, नेत्र देख,

अनगिनत हाथ-जंघा-पैरों को देख

उदर अनेक, विकराल भाव से

व्यथित सभी, मैं भी व्याकुल!'

'हे विष्णो!

कहां सौम्य मुखमण्डल,

चेहरे पर धीमी सी मुस्कान!

और कहाँ विकराल रूप यह नभ छूता,

वर्ण अनेक, कैसे मुख चारों ओर!

विशाल नेत्र हैं दैदीप्यमान!

अन्त:करण भयभीत हुआ

मैं धीरज-शांति खो रहा!'

'हे देवेश!

भूल दिशा ज्ञान मैं भटक रहा,

विकराल रूप देख दिग्भ्रमित हुआ |

अग्नि समान प्रज्ज्वलित मुखमण्डल देख

जल रही देखो मेरी त्वचा!'

'हे जगन्नाथ!

दया करो, के दया निधान!

लौटा दो अब वही सौम्य मुस्कान!'

'मैं देख रहा,

भयभीत हुआ!

धृतराष्ट्र पुत्र सभी,

राज समुदाय सभी,

भीष्म पितामाह, गुरु द्रोणाचार्य, कर्ण

और बहुत से यौद्धा हमारे,

विकराल-भयानक दाढ़ों से ग्रसित

मुखों में आपके प्रवेश कर रहे!

कई शूरवीर चूर्ण सिरों से

दांतो में आपकी फंसे हुए |

यह कैसी लीला है!

जो हुआ नहीं

वह भी हो रहा!'

'समुद्र की ओर जैसे नदियों का

जल दौड़ता,

वैसे ही नरलोक के वीर सभी

प्रज्ज्वलित मुखों में आपके

दौड़ रहे!

अग्नि मोह से आकर्षित हो

जैसे पतंगा नष्ट हो जाता,

वैसे ही यह शूरवीर हैं,

मोह में कैसे फंसे हुए,

दौड़ रहे हैं मुख की ओर!

कैसा है विकराल रूप |

उग्र भाव में ग्रास बने हैं

वीर सभी!'

'हे विष्णो! यह कैसी लीला है,

अतृप्त भाव से आप भी

उन्हें बार-बार चाट रहे हैं |

यह उग्र प्रकाश पुन्ज विलक्षण,

जगत समग्र सन्तप्त विलक्षण!'

'हे देवों में श्रेष्ठ!

मुझे परिचय दो इस रूप का!

मुझे परिचय दो इस समग्र रूप का!'

'हे देव! आपको नमस्कार!

मन प्रसन्न करो अपना,

भयभीत हूँ परिचय दो अपना!

कैसी प्रवृति, कैसा भाव यह

कैसा रहस्य यह,

उत्सुक हूं, परिचय दो अपना!'

श्री भगवान बोले

'एक रूप मेरा जन्मदाता का,

एक रुप मेरा आश्रयदाता का,

यह रुप मेरा महाकाल का!'

'जिन प्राणियों का अन्त समय आया है,

वे सब अब जाएँगे!

कैसे-कब, सब निश्चित है,

मेरे रूप में सब समाएंगे!

तुम कायरता से युद्ध छोड़ रहे,

स्वजन देख मुंह मोड़ रहे |

यह जानो कि मरण तो सबका

निश्चित है |

रक्षा अब नहीं हो सकती,

इन्हें कालग्रास अब बनना है!

'जान इस मृत्यु-योग को,

उठ! धैर्य दिखा!

युद्ध कौशल दिखा!

यश प्राप्त कर

और शत्रुओं पर विजय पा!

राज्य-सुख भोग

धन-धान्य युक्त अब राजधर्म निभा!'

'एक ओर किसी का अन्त लिए है,

दूसरी ओर तेरे लिए

राज्य-सुख हाथ फैलाए

खड़ा है |

देखो! कैसी ये माया है!

किसी के लिए

एक ही क्षण में विध्वंस

और

किसी के लिए

सब सुख लिखा है!'

'यह सुख-दु:ख का चक्र,

यह जन्म-मृत्यु का चक्र,

चल रहा निरन्तर,

मेरे भाव में देखा तुमने,

इस विराट रूप में सब

उपस्थित!

यही भाव तुझे समझाया है,

जानकर यह सब,

उठकर युद्ध कर!'

'जो शूरवीर देखे तुमने

निकट भविष्य में मेरे हुए,

उठो हे सव्यसाची!

निमित्त बनो मेरे,

दोनो हाथ से बाण चलाकर

धर्म रक्षा हेतु युद्ध करो!

यह धर्म पालन तुझे

मेरा माध्यम ही तो बना रहा,

तू जिस प्राणी का मरना निश्चित,

उसे ही तो मारने जा रहा!'

'द्रोणाचार्य, भीष्म पितामाह

जयद्रथ और कर्ण

और बहुत से योद्धाओं का अन्त

है निश्चित!

भय से रहित बन,

सब बैरी लोग काल के ग्रास बनेंगे |

सब पर तेरी विजय निश्चित,

उठ! संशय रहित बन,

मोह-ममता रहित बन,

धर्म के नाम पर कर्म निभा,

अर्जुन! उठ! निर्णायक युद्ध

का बिगुल है बज उठ!'

संजय तब बोला

'हे राजन!

वचन सुनकर केशव के,

सूर्य के समान प्रकाशमान

दिव्य मुकुटधारी

अर्जुन हाथ जोड़,

भयभीत हुआ

नतमस्तक होकर

श्री कृष्ण को करुणामयी वाणी से बोला

'हे अन्तर्यामी!

एक ओर जग हर्षित होता,

एक ओर जग प्रेम में डूबा,

दूसरी ओर तेरा रूप भयंकर,

दौड़ रहे सब राक्षसजन इधर-उधर!

यह मेरे लिए है रूप रचा

यह रूप भयंकर मैंने देखा,

लीला तुम्हारी का रहस्य खुला |

यह विराट रूप वास्तव में जग है,

यह भाव सभी इस जग की दिनचर्या

यह अद्भुत स्वरूप देख

मैं भयभीत हुआ!'

'हे महात्मन!

हे जगत के परम आधार!

जगत की रचना करने वाले

ब्रह्मा को तुमने बनया,

देव-ऋषियों का रूप रचा,

वे सब भी नतमस्तक हैं |'

'हे अनन्त! तू असीम है!

हे जगन्निवास!

तेरा अभाव नहीं हो सकता,

तू सत् आत्म भाव युक्त है,

तू ही असत् का रूप है

और तू ही सत्-असत्

से विरक्त भी है !'

'तेरा भाव समझने की बात है |

तेरा रूप जानने की बात है |

तुझे पहचानने में एक क्षण भी

लग सकता,

और जन्म-जन्म तू समझ नहीं आता !'

'तू सच्चिदानन्दन परम ब्रह्म

तू अविनाशी सबका पालनहार,

तुझे बार-बार मेरा नमस्कार!'

'देवों के देव तुम्ही हो,

सनातन नित्य पुरुष परमात्मा तुम्हीं हो!

इस सृष्टि के परम आश्रय दाता तुम्हीं हो!

सृष्टि का भरण-पोषण तुम्हीं करते!

सृष्टि को प्रलय भाव में तुम्हीं ले जाते!

प्रलय में अपने अंश में सभी समेटे!'

'नित्य दृष्टा तुम्हीं,

सर्वज्ञ तुम्हीं

तुम्हारे सदृश नहीं कोई |

तेरा रूप जानने योग्य है!

तुझे समझना परम उद्देश्य है |

तू साक्षात परम परमेश्वर है!

तू मुक्त हुए पुरुषों की परम गति है,

तू परम धाम परमेश्वर है!

तेरा रूप अनन्त,

यह ब्रह्माण्ड है तुममें व्याप्त हुआ |

कहीं कुछ और नहीं

बस तेरा रूप ही अब दिखता |'

'तुम्हीं वायु हो,

तुम्हीं यमराज!

तुम्हीं अग्नि हो,

तुम्हीं वरुण-चन्द्रमा तुम्हीं हो,

तुम्हीं ब्रह्मा हो,

और तुम्हीं ब्रह्म के रचियेता हो!

तुम्हीं तुम हो,

तुम्हें मेरा कोटि-कोटि नमस्कार!

नमस्कार,

एक बार नहीं

बार-बार नमस्कार

नमस्कार!'

'हे अनन्त सामर्थ्य वाले ईश्वर!

सब दिशाओं में व्याप्त हो तुम|

तुम्हें मेरा नमस्कार,

तुम्हें आगे से, तुम्हें पीछे से,

ऊपर से, नीचे से,

दायें से, बायें से,

सब ओर से मेरा नमस्कार!'

'तुम सर्व रूप हो,

हर अणु में व्याप्त हो,

हर भाव का नया रूप हो |'

'अज्ञानता से मैं

सखा समझ केवल अपना,

प्रेम से, प्रसाद से 'हे कृष्ण!'

'हे सखे!' 'हे यादव!'

कहता रहा |

हे अच्युत! बिना जाने

बिना सोचे,

मैंने हठात विनोद भाव से

अपराध किया!

बिना जाने, बिना पहचाने

मैं मूढ़मति

नहीं जान पाया |

चलते-फिरते,

उठते-सोते,

सखा जान अपराध किया,

मुझे क्षमा करो

हे जगन्नाथ!

मैं अज्ञान भाव में न जान सका |'

'जगत पिता हो,

सबके गुरु

अति पूज्यनीय हो |

हे अनुपम प्रभाव युक्त स्वामी!

इस सृष्टि की पालन हार

तुम सदृश कोई नहीं |

कौन है ऐसा जो तुलना कर पाए!

हे दयामय!

सखा जान मैंने तुलना की,

बार-बार मैंने दुष्टता की |

अब तुम्हीं क्षमा प्रदान करो,

अब तुम्हीं क्षमा प्रदान करो!'

'हे प्रभो!

पिता पुत्र के,

मित्र मित्र के,

पति अपनी प्रियतमा पत्नि के

अपराध सहन कर सकता,

वैसे ही मेरे अपराध भाव को

क्षमा करो !

प्रसन्न होकर

मेरा निवेदन स्वीकार करो!'

'मैं हर्षित हो

आश्चर्यमयी यह रूप देखकर,

मैं व्याकुल भी हूँ मन से,

इस विराट रूप को देखकर,

सौम्य रूप तुम्हारा, गुण, प्रभाव

मुझे हर्षित करता,

वही विकराल रूप मुझे व्याकुल करता |'

'लौट आओ, अपनी मुद्रा में!

मुझे वही सौम्य रूप दिखाओ!

मुझे वही सौम्य रूप दिखाओ!

मुझे वही चतुर्भुज रूप दिखाओ

मुझे परमधाम में स्थित अपना

विष्णुरूप दिखाओ |'

'हे देवेश!

हे जगन्नाथ!

प्रसन्न हो जाओ |

अपना सौम्य रूप दिखाओ |

हे विश्व रुप!

हे सहस्रबाहो!

मुकुट धारण किए,

हाथ में गदा-चक्र लिए,

सौम्य सी मुस्कान से,

अपने चतुर्भुज रूप में प्रकट

हो जाओ!'

देखो! भाग्य देखो

अर्जुन का!

ईश्वर का विराट रूप देखा,

ईश्वर का मनुष्य रूप देखा,

ईश्वर का सौम्य रूप भी देखेगा |

भक्ति में शक्ति कितनी होती!

भक्ति में श्रद्धा से कैसे

कृष्ण रूप को पा सकते!

श्री भगवान बोले

'हे अर्जुन!

तुम मेरे प्रिय,

तुम मेरे सखा बने हो |

तुम्हारी भक्ति, तुम्हारी प्रार्थना

बनी थी सर्वोपरि,

तभी तुम्हे यह रूप दिखाया |

इस आलौकिक रूप से

न भय करो, न व्यकुल हो |'

'इस विराट रूप के दर्शन

योग शक्ति से होते हैं !

इस विराट रूप के दर्शन दिव्य दृष्टि से होते हैं |

यह रूप दिव्य प्रकाश का पुन्ज है |

पर यह भी पूर्ण नहीं |'

'यह बस केवल एक अंश है |

हे अर्जुन!

मनुष्य लोक में

यह रूप फिर से न कोई देख पाएगा |

न वेद पढ़कर ,

न यज्ञ करके,

न दान से, न ज्ञान से |

न वर्ण-धर्म के पालन से,

न उग्र भाव धारण करके

अब कोई इस रूप के दर्शन

न कर पाएगा |

अब व्याकुल मत हो!

मूढ भाव अब त्याग दो!

भय रहित बन,

प्रीतियुक्त वही अर्जुन बन!

देख! मन कर अपना प्रसन्न,

देख! मेरा शंख-चक्र-गदायुक्त

चतुर्भुज रूप अब देख!'

और कृष्ण ने अपना

चतुर्भुज रूप दिखाया |

सौम्य भाव में लौटकर

मनुष्य रूप धारण कर,

वासुदेव ने अर्जुन को

धीरज दिया |

अर्जुन भी

दर्शन पाकर सौम्य रूप

का शांत-चित्त

होकर बोला -

'हे जनार्दन!

मधुर-शांत यह सौम्य रूप

को फिर से देख कर,

मेरा चित्त स्थिर अब हो गया |

मैं स्वाभाविक स्थिति में लौट आया |

भय-व्याकुलता अब दूर हुई,

अपनी स्थिति में मैं लौट आया |'

श्री भगवन तब बोले,

'मेरा चतुर्भुज विष्णु रूप,

मायातीत, दिव्य गुणों से युक्त,

नित्य रूप का दर्शन भी दुर्लभ है |

देव पुरुष भी इच्छा रखते,

इस रूप को देखने की |

चह चतुर्भुज रूप

न वेदों से, न तप से,

न दान से, न यज्ञ से देख सकते |

यह अनन्य भक्ति से,

एकीभाव में स्थापित होकर

प्रत्यक्ष दिखता है |'

'हे अर्जुन!

जो प्राणी कर्तव्य कर्म करता,

ममता आसक्ति अहम् त्याग

सब मुझको समर्पित करता,

जो भक्ति में शक्ति पाता,

वैर भाव मन में न रखता,

वह अनन्य भक्ति पूर्ण

प्राणी नित्य

मुझे पा लेता |

वह मेरा ही रूप बन

मुझमें आत्मसात हो जाता |'