+91-11-41631787
कविता में गीता
Select any Chapter from
     
विभूति योग ( VIBHUTI YOG )
ISBN: 81-901611-05

विभूति योग

श्री भगवान बोले,

हे महाबाहो !

भक्ति का तत्व अत्यंत गहन,

बार-बार उसे तू सुन,

श्रद्धा-प्रेम से उसे समझ ।

उपदेश मेरा तुझे परमात्मा

का तत्व समझाएगा ।

यह परम गोपनीय भाव तुझे

ईश्वर के गुण-प्रभाव और तत्व का

रहस्य विधि पूर्वक समझाएगा ।

तुम्हारा मुझमें अतिशय प्रेम,

वचन सुनते मेरे तुम

पूर्ण श्रद्धा और प्रेम से ।

इसीलिए मैं तुम्हें बार-बार

इस परम गोपनीय

गुण-प्रभाव और तत्व

का रहस्य खोल रहा ।

तुम्हारी हितकामना

मेरा लक्ष्य बना ।

'मैं देव-ऋषियों का आदि कारण,

उनका निमित्त और प्रभाव भी मैं हूँ |

मैं कब किस रूप में प्रकट होकर,

कब कैसी लीला रचूँगा

देव-ऋर्षि भी न जान सकें |

मेरी लीला का महत्व

मेरे आने पर ही खुल पाता |'

'जो ईश्वर को अजन्मा माने,

जो ईश्वर को अनादि, जन्म रहित जाने,

वह ईश्वरीय-तत्व को पहचाने |

मनुष्यों में वह ज्ञानवान की श्रेणी पाए |

ईश्वर की नित्यता, सर्वव्यापकता

समझकर

वह सम्पूर्ण पापों से मुक्त हो जाए |'

'ईश्वर हर भाव में स्थित है,

ईश्वर हर रूप में स्थापित है |

प्रकृति के कण-कण में

सदा से, सदा के लिए

कारण बन सबका,

विराजमान है |'

'ईश्वर तुम्हारी निश्चय करने की शक्ति

का भाव है |

ईश्वर तुम्हारा यथार्थ ज्ञान है |'

'ईश्वर ज्ञानी पुरुषों में मोहभाव

की विरक्ति करता |

ईश्वर क्षमा-सत्य,

सुख-दु:ख,

भय-अभय, के भाव में है |'

'ईश्वर इन्द्रियों को वश में

करने का हेतु है |

ईश्वर मन में समता स्थापित करता |

ईश्वर संतोष-दान-तप-कीर्ति-अपकीर्ति

के भाव में विराजमान है |'

'स्वधर्म पालन हेतु,

कर्म यज्ञ हेतु,

सब भाव ईश्वर की सत्ता-शक्ति

से स्थापित होते |

सृष्टि है, ईश्वर से है |

ईश्वर सर्वत्र विराजमान है |

प्राणी मात्र की सत्ता में

ईश्वर का प्रबल योगदान है |'

'सप्त महर्षियों का जन्म

ईश्वर के संकल्प से हुआ |

इन्हीं से प्रजा का विस्तार हुआ |

यही धर्म की व्यवस्था चलाते |'

'जगत की रचना के

हर नए कल्प में

स्वयं भगवान

ब्रह्मा का रूप धर कर करते |

ब्रह्मा ने मन से अपने

मरीचि, अंगिरा, पुलस्त्य,

पुलह, क्रतु और वशिष्ठ

सप्त ऋषियों की रचना कर दी |

ये प्रवृत्ति मार्ग का

संचालन करते,

ब्रह्मा के कर्म इन्हीं से

निष्पादित होते |'

'पूर्व कल्प में

प्रलय काल के समय

नष्ट हुए आत्म तत्व के ज्ञान

को पुन: प्रचारित करने,

ईश्वर

सनक, सनन्दन, सनातन

और सनत्कुमार

नाम से चार रूपों में प्रकट हुए |

इन मनुष्यों ने आत्म तत्व का

फिर से उपदेश दिया |'

'ईश्वर के संकल्प से

सृष्टि की नई सुबह होती |

ब्रह्मा का एक दिन

सृष्टि का एक कल्प होता |

इस एक दिन में

चौदह मनु स्थित होते |

प्रत्येक मनु के काल को

मन्वन्तर कहते |'

एक मन्वन्तर

मानवी गणना में

तीस करोड़ सड़सठ लाख

बीस हजार वर्ष का होता |

प्रत्येक मन्वन्तर में

धर्म की व्यवस्था और

लोक रक्षण के लिए

भिन्न-भिन्न सप्तर्षि होते |

एक मन्वन्तर बीत जाने पर

मनु भी बदल जाते |

उन्हीं के साथ-साथ

सप्तर्षि, देवता, इन्द्र और मनुपुत्र

भी नए रूप लिए आते |

ब्रह्मा के इस कल्प में

स्वयम्भुव, स्वरोचित,

उत्तम, तामस, रैवत और

चाक्षुप, वैवस्वत, सावर्णि, दक्षसावर्णि,

ब्रह्मसावर्णि, धर्मसावर्णि,

रुद्रसावर्णि, देवसावर्णि

और इन्द्रसावर्णि मनु स्थापित हैं |

'ब्रह्मा से उत्पन्न

सभी तत्व ईश्वरीय तत्व का भाव लिए,

ईश्वरीय संकल्प से उत्पन्न हुए |

इसी भाव से सब प्राणी

इस संसार में स्थापित हुए |'

'जो पुरुष ईश्वर के

इस स्वरूप को समझता है,

योग शक्ति के तत्व का

भाव समझता है,

वह निश्छल भक्ति योग युक्त होता है |'

'संशय रहित यह भाव जानो,

संशय रहित होकर

ईश्वर पहचानो |

सम्पूर्ण जगत,

की उत्पत्ति का

कारण ईश्वर है |'

'ईश्वर के योग बल से ही

यह सृष्टि चक्र है चल रहा ।

ईश्वर की शासन-शक्ति से

सूर्य-चन्द्र-तारे और

पृथ्वी नियम में बँध कर

विचर रहे |

समस्त प्राणी बार-बार

जन्म धर कर

अपने कर्मो का फल भोग रहे |'

'सबका नियन्ता और प्रवर्तक

ईश्वर को सब समझकर बार-बार

चेष्टा में संलग्न

ऊपर उठने को,

अच्छे से और अच्छा बनने को |'

'ज्ञान युक्त मानव

श्रद्धा-भक्ति से

ईश्वर के गुण-प्रभाव को समझते हैं,

सदा-सर्वदा ईश्वर में मग्न होकर

ईश्वर को स्मरण रखते हैं |'

'निरन्तर ईश्वर में मन लगाने वाले,

प्राणों को स्थिर कर ईश्वर में,

भक्ति से स्थापित होकर ईश्वर में,

भक्त सदा ईश्वर भक्ति

की चर्चा करते |

ईश्वर के प्रभाव को सदा समझते |

वे सदा सन्तुष्ट रहते,

वे सदा वासुदेव को

स्मरण कर,

वासुदेव में ही रमण करते |'

'प्रेम योग से ईश्वर

भजन करके,

सदा ध्यान में लगे हुए,

तत्व ज्ञान योग समझ पाते |

तत्व ज्ञान से अन्त:करण में

ईश्वरीय लीला, रहस्य,

महत्व, प्रभाव के भाव

स्थापित कर पाते |

वे बुद्धियोग में

संयमित मन से

ईश्वर को अवश्य प्राप्त होते |'

'हे अर्जुन!

अपने भक्तों पर अनुग्रह करके,

तत्व ज्ञान का दीप जलाता |

अन्त:करण में स्थित होकर

अज्ञान जनित अन्धकार को

प्रकाशमय कर देता |'

अर्जुन बोला-

'आप परम ब्रह्मां,

परम धाम,

और

परम पवित्र हैं |

सनातन दिव्य पुरुष,

देवों के आदि देव,

सर्वव्यापी माने सब ऋषिगण |

देवर्षि नारद, देवल ऋषि

और ऋषि वेदव्यास का यही कथन |

स्वयं आप ने कहे अपने

अतुलनीय प्रभाव के वचन |'

'हे केशव!

तुम जो कहते मुझसे,

वही सत्य स्वीकारता मैं,

हे भगवान! लीलामयी हो,

नए रूप रचते हो |

देवता लोग न पहचान पाएँ ,

असुर भी न जान पाएँ |

आपके नए रूप को न

पहचान पाएँ |'

हे समस्त प्राणियों को उत्पन्न

करने वाले!

हे प्राणियों के ईश्वर!

हे देवों के देव!

हे जगत के स्वामी!

हे पुरुषोत्तम!

अपरिमित रूप-गुण-प्रभाव व लीला,

अपरिमित है ज्ञान, रहस्य, प्रभाव सभी का |

स्वयं को ही पहचानते हो,

स्वयं की लीला जानते हो |

तेज-बल-विद्या-ऐश्वर्य-शक्ति

से युक्त हो,

दिव्य विभूतियों के स्वयं ही ज्ञाता हो |

समस्त लोक हैं व्याप्त जिनसे,

ऐसी विभूतियों का वर्णन तुम्हीं

कर सकते |'

'हे योगेश्वर!

कैसा चिन्तन करूँ ?

कैसे पहुँचूँ तुम तक भगवन्?

किस-किस रूप में तुम्हें भजूँ ?

किस-किस भाव में करूँ चिन्तन?'

'हे जनार्दन!

जो ईष्ट भाव को मैं चाहूँ ,

उसको देने में समर्थ तुम !

बार-बार यही इच्छा मेरी,

प्रकट होने की योग शक्ति,

और विभूति,

तत्व रहस्य फिर से कहो,

अविचल भक्ति है योग साधना,

बार-बार सुनने की मेरी भावना |

अमृतमय वचन तुम्हारे,

तृप्त नहीं कर पा रहे |

उत्कण्ठा फिर-फिर हो रही,

प्यास निरन्तर बढ़ रही |'

श्री भगवान बोले

'हे कुरुश्रेष्ठ!

मेरे विस्तार का अन्त नहीं |

सम्पूर्ण विश्व मेरा स्वरूप है,

ईश्वर का ही रूप है |

हर प्राणी-हर वस्तु

जड़ हो या हो चेतन,

वह ईश्वर की दिव्य विभूति |

अनन्त विभूतियों के योग से

तेज-बल-विद्या-ऐश्वर्य-

कान्ति और शक्ति का विकास हो |

विस्तार का मेरे अन्त नहीं

फिर भी जो कुछ प्रधान,

उसे मैं कहता हूँ |

हे गुडाकेश !

निद्रा पर विजय पा चुके,

अज्ञान रूपी निद्रा पर भी विजय पाओ |

मेरे भाव समझो

मेरे उपदेश धारण करो |

समस्त प्राणी जगत के हृदय में

स्थित चेतन स्वरूप आत्मा हूँ |

समस्त प्राणी का सृजन, पालन

और अन्त भी मैं हूँ |

प्राणी मुझसे ही उत्पन्न होते,

मुझमें ही स्थित रहते

और

मुझमें ही लीन हो जाते |

अदिति के बारह पुत्रों में,

श्रेष्ठ पुत्र विष्णु भी मैं हूँ |

समस्त ज्योतिपुन्जों में

ज्योर्तिमय सूर्य भी मैं हूँ |

उन्चास वायु देवताओं का तेज भी मैं हूँ |

सत्ताईस नक्षत्रों का स्वामी,

सम्पूर्ण तारा मण्डल का राजा

चन्द्रमा भी मेरी ही विभूति है |

मधुर संगीतमय,

रमणीय स्तुतियों से युक्त

सामदेव भी मैं हूँ |

देवों के राजा इन्द्र भी

मेरा ही स्वरूप है |'

'चक्षु, श्रोत्र, त्वचा, रसना,

ध्राण, वाक, हाथ, पैर,

उपस्थ, गुदा और मन,

इन ग्यारह इन्द्रियों में

मन राजा |

दस शेष इन्द्रियों का स्वामी प्रेरक

सूक्ष्म और श्रेष्ठ |

इस जीवन के हर भाव में

'मन' प्रधान,

यह मन भी मैं हूँ |

समस्त प्राणियों की

चेतना शक्ति भी मैं हूँ |'

'हर','बहुरूप ', 'त्रयम्बक',

'अपराजित', 'वृषाकपि',

'शम्भु', 'कपर्दी', 'रैवत',

'मृगव्याध', 'शर्व' और 'कपाली'

ये ग्यारह रुद्र कहलाते |

इन के राजा शम्भु 'शंकर' हैं |

वह 'शम्भु' भी मैं हूँ |'

'यक्ष और राक्षसों का राजा

कुबेर है |

वही उनमें श्रेष्ठ है |

धन का लोकपाल कुबेर भी मैं हूँ |

धर', 'ध्रुव'

'सोम', 'अहं'

'अनिल', 'अनल'

'प्रत्यूष' और 'प्रयास'

है आठ वसु,

इनका राजा 'अनल' भी मैं हूँ |'

'सुवर्ण-रत्नों का भण्डार,

नक्षत्र और द्वीपों का केन्द्र

सुमेरू पर्वत भी मैं हूँ |'

'देवताओं का कुल पुरोहित,

विघा-बुद्धि में सर्वश्रेष्ठ

बृहस्पति भी मैं हूँ

'हे पार्थ !

समस्त सेनापतियों में प्रधान,

स्कन्द है प्रधान,

महादेव पुत्र कार्तिकेय भी यही,

यह मेरा ही स्वरूप जान |'

'सब जलाशय

जिसमें समा जाते,

उसे ही वे राजा कहते,

वह समुद्र भी मैं हूँ |'

'मैं महर्षियों में भृगु ऋषि,

शब्दों में एक अक्षर 'ओंकार' हूँ |

यज्ञों में जपयज्ञ हूँ |

स्थिर रहने वालों में हिमालय

पहाड़ हूँ |'

'मैं वृक्षों में पीपल हूँ,

देवर्षियों में नारद मुनि,

गन्धर्वों में चित्ररथ,

और सिद्धों में कपिल मुनि हूँ |'

'समुद्र मन्थन से अमृत के संग

उच्चै:श्रवा की उत्पत्ति हुई,

इसीलिए वह अमृत तुल्य माना गया |

वह घोड़ों का राजा उच्चै:श्रवा भी मैं हूँ |

हाथियों में श्रेष्ठ ऐरावत भी मैं हूँ |

और मनुष्यों का राजा भी तू

मुझको जान |'

'मैं शस्त्रों में वज्र,

गायों में कामधेनु हूँ |

शास्त्र-विधि से सन्तान उत्पत्ति का हेतु

कामदेव भी मैं हूँ |

और सर्पो का राज वासुकि भी मैं हूँ |

मैं नागों में शेषनाग,

जलचरों का अधिपति वरुण देव हूँ |

पितरो में प्रधान अर्यमा मैं हूँ |

और दण्ड-न्याय-धर्म से युक्त

यमराज भी मैं हूँ |

'मैं दिति वंशज दैत्यों में,

सर्वसदगुणसम्पन्न, परम धर्मात्मा,

श्रद्धालु, निष्काम और अनन्य प्रेमी भक्त

प्रहलाद हूं |'

'गणना का आधार समय मैं हूँ |

पशुओं में मृगराज सिंह भी मैं हूँ

और पक्षियों में गरुड़ भी मैं हूँ |

तीव्र गति युक्त पवित्र वायु भी मैं हूँ |

शास्त्र धारियों में श्री राम हूँ,

और मछलियों में मगरमच्छ भी मैं हूँ |

नदियों में पवित्र गंगा हूँ |'

'हे अर्जुन!

सृष्टियों का आदि,

मध्य और अन्त भी मैं हूँ |

मैं विद्याओं में आध्यात्म विद्या,

वाद-विवाद करने वालों में

तत्व-निर्णायक वाद भी मैं हूँ |'

'स्वर-व्यंजन आदि जितने अक्षर,

उन सबमें आदि सबका है 'अकार'

वही सभी में व्याप्त है |

समस्त वाणी अकार है |

इस कारण अकार सब वर्णों में श्रेष्ठ है |

वही मेरा रूप है |'

'द्वन्द्व-समास में दोनों पदों की प्रधानता होती,

उसे अन्य समासों से श्रेष्ठ करती,

मैं वही द्वन्द्व-समास हूँ |

'मैं काल का भी महाकाल हूँ |

इसका क्षय नहीं होता,

इसीलिए अक्षय कहलाता |'

'मैं विराट रूप धारण कर

सबका धारण-पोषण करता,

मैं सर्वव्यापी, सब ओर मुखवाला,

विराट-विश्वरूप हूँ |'

'मैं मृत्युरूप होकर

सबके अन्त समय में आता,

मैं जन्म भाव लिए

प्राणी को बार-बार जन्म करवाता |

उत्पत्ति का हेतु भी मैं हूँ,

उत्पत्ति का स्वरूप भी मैं हूँ |'

'मैं स्त्रियों में श्रेष्ठ

कीर्ति, श्री, वाक्, स्मृति

मेधा, धृति और क्षमा हूँ |

गायन करने योग्य 'बृहत् साम' भी मैं हूँ,

छन्दों में गायत्री छन्द मैं हूँ,

मासों में प्रथममास मार्गशीर्ष मैं हूँ

और ऋतुओं में बसन्त ऋतु मैं हूँ |'

'मैं छल करने वालों में जुआ,

प्रभावशाली पुरूषों का प्रभाव हूँ |

मैं विजयी होने वालों की विजय हूँ,

निश्चय करने वालों का निश्चय हूँ

और सात्विक पुरुषों का सात्विक भाव हूँ |'

'मैं अजन्मा-अविनाशी-सर्वशक्तिमान

पूर्णब्रह्म परमेश्वर भी हूँ

और

वृष्णिवंशी वासुदेव,

तेरा सखा कृष्ण भी मैं हूँ |

'मैं ही पाण्डवों में

वीर धनन्जय अर्जुन,

मुनियों में वेदव्यास

और कवियों में

शुक्राचार्य कवि भी

मैं हूँ |'

'धर्म का त्याग कर

अधर्म में प्रवृत

उच्छृंखल मनुष्यों को

पापाचार से रोक कर

सत्कर्म में प्रवृत

करने वाला दण्ड भी मैं हूँ |'

'मैं वो दमन शक्ति हूँ

जो न्यायपूर्वक

कर्मपालन में लगाती |

मैं युद्ध में जीत

के इच्छा वाले योद्धाओं की

नीति हूँ |'

'मैं गुप्त रखने वाले भावों

का रक्षक मौन हूँ ।

मैं ज्ञान वानों

का तत्व ज्ञान हूँ |'

'और हे अर्जुन!

सब प्राणियों की उत्पत्ति का

कारण भी मैं हूँ |

समस्त चर-अचर

प्राणियों का परम आधार हूँ |

मैं ही सब में व्याप्त हूँ |'

'हे परन्तय !

मेरी दिव्य विभूतियों का अन्त नहीं |

कोई सीमा नहीं

क्योंकि ये भाव असीम है |

जैसे जल-वायु-आकाश

में असंख्य परमाणु क्षेत्र हैं,

असंख्य ध्वनि क्षेत्र हैं

वैसे ही मेरा अस्तित्व,

मेरी विभूतियाँ

असंख्य हैं |

उनका कोई भी पार नहीं पा सकता |

अंश मात्र वर्णन ही

सम्भव था,

वह मैंने तुमको कह दिया |'

'इसके अतिरिक्त

जो कोई भी प्राणी

या जड़ वस्तु

ऐश्वर्य सम्पन्न

शोभा-कान्ति जैसे गुणों से सम्पन्न है,

बल, तेज, पराक्रम जैसी शक्ति से

युक्त है,

उस प्राणी या

उस वस्तु को तुम

ईश्वर के तेज का अंश मानो |

उसे ईश्वर ही जानो |'

'एक ही है

जो अनन्त है,

असीम है,

अव्यक्त है |

हे अर्जुन!

एक तत्व ही मन में धारण करो |

ईश्वर की योगशक्ति को समझो |

सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड ईश्वर के

एक अंश में व्याप्त है |

जो कुछ है, वह ईश्वर से है ।

जो हो रह है, वही ईश्वर है ।'