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कविता में गीता
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गीता धर्म ( GITA DHARM )
ISBN: 81-901611-05


गीता धर्म


श्री कृष्ण मेरी तुम्हारी आत्मा है ।

अर्जुन है मन,

मन में आए हर संशय का

श्री कृष्ण ने किया निवारण ।

ज्ञान योग का साधन अपनाकर

भक्ती भाव मन में अपनाकर

कर्म योग की साधना से

साधन बताया एक नए समाज का ।

राह सुझाई एक उन्नत समाज की

एक धर्म निरपेक्ष समाज की संरचना में

अर्जुन को भारत कह

एक सर्वधर्म युक्त समाज के निर्माण की नींव रखी

वह एक विश्व

एक भारत के निर्माण का स्वप्न

जो युगों-युगों से निहित है इस गीता शास्त्र में,

वह ज्ञान जो लुप्त प्राय: हो चला है

या फिर अपनी-अपनी विचार धारा से

मूल भाव को भूल मानव

वर्ण भेद को आधार स्तम्भ बनाकर

नए सिरे से, एक नए भाव को रच रहा है।

जो गीता भाव से विपरीत है

यह वर्ण भेद न कभी था,

न कभी इसका वर्णन किया श्री कृष्ण ने

श्री कृष्ण ने कर्म के अनुसार,

भावनाओं के आधार पर

अपने ज्ञान से

अपने संस्करो से सभी कर्मो को

सभी धर्मो को एक समान देखने का

सपना लिया था

वर्ण भेद केवल कर्म का मर्म

समझाने के लिए किया था

न कि वर्ण भेद पर आधारित

किसी समाज के निर्माण को कहा था

शरीर की संरचना को समझा कर

समाज के प्रत्येक अंग

का निरूपण किया था

एक नए भारत के निर्माण में

यदि गीता का ज्ञान हम संचालित कर लें तो

यह वर्ण भेद, यह समाज में फैल रहे

हम वर्ण-धर्म भेद के राक्षस से हम

सरल भाव से, सरल ज्ञान से पीछा छुडा़ पाएंगे

हम एक नए भारत की

एक नए समाज की रचना कर पाएँगे

आओ! गीता की इस कविता का

महत्व समझ कर,

आओ! इस धर्म भेद की दीवार तोड़ कर

हम गीता-धर्म की राह अपनाएँ,

एक नए समाज की नींव रखें

जो भारत कहलाए

जो सब धर्मो की नींव पर टिका,

कर्म योग के माध्यम से

नई दिशा को अग्रसर हो

नए देश के निर्माण में

हम सब अपना योगदान दें

श्री कृष्ण विश्वरुप है

समग्र विश्व यह उन्हीं के रुप में समाया है

और गीता-शास्त्र में निहित वचन

किसी एक धर्म-समुदाय को नहीं

सर्वधर्म युक्त भारत वर्ष को नहीं

अपितु सम्पूर्ण विश्व में रचे-बसे

समस्त धर्मो को एक नई दिशा प्रदान करते है

आओ! हम सब एक विश्व

एक मानव-धर्म को साकार रूप से

देखने का प्रयत्न करें ।