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कविता में गीता
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विभूति योग (VIBHUTI YOG)
ISBN: 81-901611-05

 विभूति योग

 
 
श्री भगवान बोले,
'हे महाबाहो!
भक्ति का तत्व अत्यन्त गहन ,
बार-बार उसे तू सुन,
श्रद्धा-प्रेम से उसे समझ |
उपदेश मेरा तुझे परमात्मा
का तत्व समझाएगा |
यह परम गोपनीय भाव तुझे
ईश्वर के गुण-प्रभाव और तत्व का
रहस्य विधि पूर्वक समझाएगा |
 
'तुम्हारा मुझमें अतिशय प्रेम,
वचन सुनते मेरे तुम
पूर्ण श्रद्धा और प्रेम से |
इसीलिए मैं तुम्हे बार-बार
इस परम गोपनीय
गुन-प्रभाव और तत्व
का रहस्य खोल रहा |
तुम्हारी हितकामना
मेरा लक्ष्य बना |'
 
'मैं देव-ऋषियों का आदि कारण,
उनका निमित और प्रभाव भी मैं हूं |
मैं कब किस रुप में प्रकट होकर,
कब कैसी लीला रचूँगा
देव-ऋर्षि भी न जान सकें |
मेरी लीला का महत्व
मेरे आने पर ही खुल पाता |'
 
'जो ईश्वर को अजन्मा माने,
जो ईश्वर को अनादि, जन्म रहित जाने,
वह ईश्वरीय-तत्व को पहचाने |
मनुष्यों में वह ज्ञानवान की श्रेणी पाए |
ईश्वर की नित्यता, सर्वव्यापकता
समझकर
वह सम्पूर्ण पापों से मुक्त हो जाए |'
 
'ईश्वर हर भाव में स्थित है,
ईश्वर हर रुप में स्थापित है |
प्रकृति के कण-कण में
सदा से, सदा के लिए
कारण बन सबका,
विराजमान है |'
 
'ईश्वर तुम्हारी निश्चय करने की शक्ति
का भाव है |
ईश्वर तुम्हारा यथार्थ ज्ञान है |'
 
'ईश्वर ज्ञानी पुरुषों में मोहभाव
की विरक्ति करता |
ईश्वर क्षमा-सत्य,
सुख-दु:ख,
भय-अभय, के भाव में है |'
 
'ईश्वर इन्द्रियों को वश में
करने का हेतु है |
ईश्वर मन में समता स्थापित करता |
ईश्वर संतोष-दान-तप-कीर्ति-अपकीर्ति
के भाव में विराजमान है |'
 
'स्वधर्म पालन हेतु,
कर्म यज्ञ हेतु,
सब भाव ईश्वर की सत्ता-शक्ति
से स्थापित होते |
सृष्टि है, ईश्वर से है |
ईश्वर सर्वत्र विराजमान है |
प्राणी मात्र की सत्ता में
ईश्वर का प्रबल योगदान है |'
 
'सप्त महर्षियों का जन्म
ईश्वर के संकल्प से हुआ |
ईन्हीं से प्रजा का विस्तार हुआ |
यही धर्म की व्यवस्था चलाते |'
 
'जगत की रचना के
हर नए कल्प में
स्वयं भगवान
ब्रह्मा का रुप धर कर करते |
ब्रह्मा ने मन से अपने
मरीचि, अंगिरा, पुलस्त्य,
पुलह, क्रतु और वरिष्ठ
सप्त ऋषियों की रचना कर दी |
ये प्रवृत्ति मार्ग का
संचालन करते,
ब्रह्मा के कर्म इन्हीं से
निष्पादित होते |'
 
'पूर्व कल्प में
प्रलय काल के समय
नष्ट हुए आत्म तत्व के ज्ञान
को पुन: प्रचारित करने,
ईश्वर
सनक, सनन्दन, सनातन
और सनत्कुमार
नाम से चार रुपों में प्रकट हुए |
इन मनुष्यों ने आत्म तत्व का
फिर से उपदेश दिया |'
 
'ईश्वर के संकल्प से
सृष्टि की नई सुबह होती |
ब्रह्मा का एक दिन
सृष्टि का एक कल्प होता |
इस एक दिन में
चौदह मनु स्थित होते |
प्रत्येक मनु के काल को
मन्वन्तर कहते |'
 
एक मन्वन्तर
मानवी गणना में
तीस करोड़ सड़सठ लाख
बीस हजार वर्ष का होता |
प्रत्येक मन्वन्तर में
धर्म की व्यवस्था और
लोक रक्षण के लिए
भिन्न-भिन्न सप्तर्षि होते |
एक मन्वन्तर बीत जाने पर
मनु भी बदल जाते |
उन्हीं के साथ-साथ
सप्तर्षि, देवता, इन्द्र और मनुपुत्र
भी नए रुप लिए आते |
 
ब्रह्मा के इस कल्प में
स्वयम्भुव, स्वरोचित,
उत्तम, तामस, रैवत और
चाक्षुप, वैवस्वत, सावर्णि, दक्षसावर्णि,
ब्रह्मसावर्णि, धर्मसावर्णि,
रुद्रसावर्णि, देवसावर्णि
और इन्द्रसावर्णि मनु स्थापित हैं |
 
'ब्रह्मा से उत्पन्न
सभी तत्व ईश्वरीय तत्व का भाव लिए,
ईश्वरीय संकल्प से उत्पन्न हुए |
इसी भाव से सब प्राणी
इस संसार में स्थापित हुए |'
 
'जो पुरुष ईश्वर के
इस स्वरुप को समझता है,
योग शक्ति के तत्व का
भाव समझता है,
वह निश्छल भक्ति योग युक्त होता है |'
 
'संशय रहित यह भाव जानो,
संशय रहित होकर
ईश्वर पहचानो |
सम्पूर्ण जगत,
की उत्पत्ति का
कारण ईश्वर है |'
 
'ईश्वर के योग बल से ही
यह सृष्टि चक्र है चल रहा |
ईश्वर की शासन-शक्ति से
सूर्य-चन्द्र-तारे और
पृथ्वी नियम में बँध कर
विचर रहे |
समस्त प्राणी बार-बार
जन्म धर कर
अपने कर्मो का फल भोग रहे |'
 
'सबका नियन्ता और प्रवर्तक
ईश्वर को सब समझकर बार-बार
चेष्टा में संलग्न
ऊपर उठने को,
अच्छे से और अच्छा बनने को |'
 
'ज्ञान युक्त मानव
श्रद्धा-भक्ति से
ईश्वर के गुण-प्रभाव को समझते हैं,
सदा-सर्वदा ईश्वर में मग्न होकर
ईश्वर को स्मरण रखते है |'
 
'निरन्तर ईश्वर में मन लगाने वाले,
प्राणों को स्थिर कर ईश्वर में,
भक्ति से स्थापित होकर ईश्वर में,
भक्त सदा ईश्वर भक्ति
की चर्चा करते |
ईश्वर के प्रभाव को सदा समझते |
वे सदा सन्तुष्ट रहते,
वे सदा वासुदेव को
स्मरण कर,
वासुदेव में ही रमण करते |'
 
'प्रेम योग से ईश्वर
भजन करके,
सदा ध्यान में लगे हुए,
तत्व ज्ञान योग समझ पाते |
तत्व ज्ञान से अन्त:करण में
ईश्वरीय लीला, रहस्य,
महत्व, प्रभाव के भाव
स्थापित कर पाते |
वे बुद्धियोग में
संयमित मन से
ईश्वर को अवश्य प्राप्त होते |'
 
'हे अर्जुन!
अपने भक्तों पर अनुग्रह करके,
तत्व ज्ञान का दीप जलाता |
अन्त:करण में स्थित होकर
अज्ञान जनित अन्धकार को
प्रकाशमय कर देता |'
 
अर्जुन बोला-
'आप परम ब्रह्मां,
परम धाम,
और
परम पवित्र हैं |
सनातन दिव्य पुरुष,
देवों के आदि देव,
सर्वव्यापी माने सब ऋषिगण |
देवर्षि नारद, देवल ऋषि
और ऋषि वेदव्यास का यही कथन |
स्वयं आप ने कहे अपने
अतुलनीय प्रभाव के वचन |'
 
'हे केशव!
तुम जो कहते मुझसे,
वही सत्य स्वीकारता मैं,
हे भगवान! लीलामयी हो,
नए रुप रचते हो |
देवता लोग न पहचान पाएँ ,
असुर भी न जान पाएँ |
आपके नए रुप को न
पहचान पाएँ |
'
हे समस्त प्राणियों को उत्पन्न
करने वाले!
हे प्राणियों के ईश्वर!
हे देवों के देव!
हे जगत के स्वामी!
हे पुरुषोत्तम!
अपरिमित रुप-गुण-प्रभाव व लीला,
अपरिमित है ज्ञान, रहस्य, प्रभाव सभी का |
स्वयं को ही पहचानते हो,
स्वयं की लीला जानते हो |
तेज-बल-विद्या-ऐश्वर्य-शक्ति
से युक्त हो,
दिव्य विभूतियों के स्वयं ही ज्ञाता हो |
समस्त लोक हैं व्याप्त जिनसे,
ऐसी विभूतियों का वर्णन तुम्हीं
कर सकते |'
 
'हे योगेश्वर!
कैसा चिन्तन करूँ ?
कैसे पहुँचूँ तुम तक भगवन्?
किस-किस रुप में तुम्हें भजूँ ?
किस-किस भाव में करूँ चिन्तन?'
 
'हे जनार्दन!
जो ईष्ट भाव को मैं चाहूँ ,
उसको देने में समर्थ तुम!
बार-बार यही इच्छा मेरी,
प्रकट होने की योग शक्ति,
और विभूति,
तत्व रहस्य फिर से कहो,
अविचल भक्ति है योग साधना,
बार-बार सुनने की मेरी भावना |
अमृतमय वचन तुम्हारे,
तृप्त नहीं कर पा रहे |
उत्कण्ठा फिर-फिर हो रही,
प्यास निरन्तर बढ रही |'
 
श्री भगवान बोले
'हे कुरुश्रेष्ठ!
मेरे विस्तार का अन्त नहीं |
सम्पूर्ण विश्व मेरा स्वरुप है,
ईश्वर का ही रुप है |
हर प्राणी-हर वस्तु
जड़ हो या हो चेतन,
वह ईश्वर की दिव्य विभूति |
अनन्त विभूतियों के योग से
तेज-बल-विद्या-ऐश्वर्य-
कान्ति और शक्ति का विकास हो |
विस्तार का मेरे अन्त नहीं
फिर भी जो कुछ प्रधान,
उसे मैं कहता हूँ |
 
हे गुडाकेश !
निद्रा पर विजय पा चुके,
अज्ञान रुपी निद्रा पर भी विजय पाओ |
मेरे भाव समझो
मेरे उपदेश धारण करो |
 
समस्त प्राणी जगत के हृदय में
स्थित चेतन स्वरुप आत्मा हूँ |
समस्त प्राणी का सृजन, पालन
और अन्त भी मैं हूँ |
प्राणी मुझसे ही उत्पन्न होते,
मुझमें ही स्थित रहते
और
मुझमें ही लीन हो जाते |
 
अदिति के बारह पुत्रों में,
श्रेष्ठ पुत्र विष्णु भी मैं हूँ |
समस्त ज्योतिपुन्जों में
ज्योर्तिमय सूर्य भी मैं हूँ |
उन्चास वायु देवताओं का तेज भी मैं हूँ |
 
सत्ताईस नक्षत्रों का स्वामी,
सम्पूर्ण तारा मण्डल का राजा
चन्द्रमा भी मेरी ही विभूति है |
मधुर संगीतमय,
रमणीय स्तुतियों से युक्त
सामदेव भी मैं हूं |
देवों के राजा इन्द्र भी
मेरा ही स्वरुप है |'
 
'चक्षु, श्रोत्र, त्वचा, रसना,
ध्राण, वाक, हाथ, पैर,
उपस्थ, गुदा और मन,
इन ग्यारह इन्द्रियों में
मन राजा |
दस शेष इन्द्रियों का स्वामी प्रेरक
सूक्ष्म और श्रेष्ठ |
इस जीवन के हर भाव में
'मन' प्रधान,
यह मन भी मैं हूँ |
समस्त प्राणियों की
चेतना शक्ति भी मैं हूँ |'
 
'हर','बहुरूप ', 'त्रयम्बक',
'अपराजित', 'वृषाकपि',
'शम्भु', 'कपर्दी', 'रैवत',
'मृगव्याध', 'शर्व' और 'कपाली'
ये ग्यारह रुद्र कहलाते |
 
इन के राजा शम्भु 'शंकर' हैं |
वह 'शम्भु' भी मैं हूँ |'
 
'यक्ष और राक्षसों का राजा
कुबेर है |
वही उनमें श्रेष्ठ है |
धन का लोकपाल कुबेर भी मैं हूँ |
 
'धर', 'ध्रुव'
'सोम', 'अहं'
'अनिल', 'अनल'
'प्रत्यूष' और 'प्रयास'
है आठ वसु,
इनका राजा 'अनल' भी मैं हूँ |'
 
'सुवर्ण-रत्नों का भण्डार,
नक्षत्र और द्वीपों का केन्द्र
सुमेरु पर्वत भी मैं हूँ |'
 
'देवताओं का कुल पुरोहित,
विद्दा-बुद्धि में सर्वश्रेष्ठ
बृहस्पति भी मै हूँ
 
'हे पार्थ!
समस्त सेनापतियों में प्रधान,
स्कन्द है प्रधान,
महादेव पुत्र कार्तिकेय भी यही,
यह मेरा ही स्वरुप जान |'
 
'सब जलाशय
जिसमें समा जाते,
उसे ही वे राजा कहते,
वह समुद्र भी मैं हूँ |'
 
'मैं महर्षियों में भृगु ऋषि,
शब्दों में एक अक्षर 'ओंकार' हूँ |
यज्ञों में जपयज्ञ हूँ |
स्थिर रहने वालों में हिमालय
पहाड़ हूँ |'
 
'मैं वृक्षों में पीपल हूँ,
देवर्षियों में नारद मुनि,
गन्धर्वो में चित्ररथ,
और सिद्धों में कपिल मुनि हूँ |'
 
'समुद्र मन्थन से अमृत के संग
उच्चै:श्रवा की उत्पत्ति हुई,
इसीलिए वह अमृत तुल्य माना गया |
वह घोड़ों का राजा उच्चै:श्रवा भी मैं हूँ |
हाथियों में श्रेष्ठ ऐरावत भी मैं हूँ |
और मनुष्यों का राजा भी तू
मुझको जान |'
 
'मैं शस्त्रों में वज्ञ,
गायों में कामधेनु हूँ |
शास्थ-विधि से सन्तान उत्पत्ति का हेतु
कामदेव भी मैं हूँ | |
और सर्पो का राज वासुकि भी मैं हूँ | |
 
मैं नागों में शेषनाग,
जलचरों का अधिपति वरुण देव हूँ | |
पितरो में प्रधान अर्यमा मै हूँ |
और दण्ड-न्याय-धर्म से युक्त
यमराज भी मैं हूँ |
 
'मैं दिति वंशज दैत्यों में,
सर्वसदगुणसम्पन्न, परम धर्मात्मा,
श्रद्धालु, निष्काम और अनन्य प्रेमी
भक्त
प्रहलाद हूं |'
 
'गणना का आधार समय मैं हूँ |
पशुओं में मृगराज सिंह भी मैं हूँ
और पक्षियों में गरुड भी मैं हूँ |
तिव्र गति युक्त पवित्र वायु भी मैं हूँ |
शास्त धारियों में श्री राम हूँ,
और मछलियों में मगरमच्छ भी मैं हूँ |
नदियों में पवित्र गंगा हूँ |'
 
'हे अर्जुन!
सृष्टियों का आदि,
मघ्य और अन्त भी मैं हूँ |
मैं विद्याओं में आध्यात्म विद्या,
वाद-विवाद करने वालों में
तत्व-निर्णायक वाद भी मैं हूँ |'
 
'स्वर-व्यंजन आदि जितने अक्षर,
उन सबमें आदि सबका है 'अकार'
वही सभी में व्याप्त है |
 
समस्त वाणी अकार है |
इस कारण अकार सब वर्णो में श्रेष्ठ है |
वही मेरा रुप है |'
 
'द्वन्द्व-समास में दोनों पर्दों की
प्रधानता होती,
उसे अन्य समासों से श्रेष्ठ करती,
मैं वही द्वन्द्व-समास हूँ |
 
'मैं काल का भी महाकाल हूँ |
इसका क्षय नहीं होता,
इसीलिए अक्ष्य कहलाता |'
 
'मैं विराट रुप धारण कर
सबका धारण-पोषण करता,
मैं सर्वव्यापी, सब ओर मुखवाला,
विराट-विश्वरुप हूँ |'
 
'मैं मृत्युरूप होकर
सबके अन्त समय में आता,
मैं जन्म भाव लिए
प्राणी को बार-बार जन्म करवाता |
उत्पत्ति का हेतु भी मैं हूँ,
उत्पत्ति का स्वरुप भी मैं हूँ |'
 
'मैं स्त्रियों में श्रेष्ठ
कीर्ति, श्री, वाक्, स्मृति
मेधा, धृति और क्षमा हूँ |
गायन करने योग्य 'बृहत् साम' भी
मैं हूँ,
छन्दों में गायत्री छन्द मैं हूँ,
मासों में प्रथममास मार्गशीर्ष
मैं हूँ
और ऋतुओं में बसन्त ऋतु
मैं हूँ |'
 
'मैं छल करने वालों में जुआ,
प्रभावशाली पुरुषों का प्रभाव हूँ |
मैं विजयी होने वालों की विजय हूँ,
निश्चय करने वालों का निश्चय हूँ
और सात्विक पुरुषों का सात्विक
भाव हूँ |'
 
'मैं अजन्मा-अविनाशी-सर्वशक्तिमान
पूर्णब्रह्म परमेश्वर भी हूँ
और
वृष्णिवंशी वासुदेव,
तेरा सखा कृंष्ण भी मैं हूँ |
 
'मैं ही पाण्डवों में
वीर धनन्जय अर्जुन,
मुनियों में वेदव्यास
और कवियों में
शुक्राचार्य कवि भी
मैं हूँ |'
 
'धर्म का त्याग कर
अधर्म में प्रवृत
उच्छृंखल मनुष्यों को
पापाचार से रोक कर
सत्कर्म में प्रवृत
करने वाला दण्ड भी मैं हूँ |'
 
'मैं वो दमन शक्ति हूँ
जो न्यायपूर्वक
कर्मपालन में लगाती |
मैं युद्ध में जीत
के इच्छा वाले योद्धाओं की
नीति हूँ |'
 
'मैं गुप्त रखने वाले भावों
का रक्षक मौन हूँ |
मैं ज्ञान वानों
का तत्व ज्ञान हूँ |'
 
'और हे अर्जुन!
सब प्राणियों की उत्पत्ति का
कारण भी मैं हूँ |
समस्त चर-अचर
प्राणियों का परम आधार हूँ |
मैं ही सब में व्याप्त हूँ |'
 
'हे परन्तय!
मेरी दिव्य विभूतियों का अन्त नहीं |
कोई सीमा नहीं
क्योंकि ये भाव असीम है |
जैसे जल-वायु-आकाश
में असंख्य परमाणु क्षेत्र हैं,
असंख्य ध्वनि क्षेत्र हैं
वैसे ही मेरा अस्तित्व,
मेरी विभूतियाँ
असंख्य हैं |
उनका कोई भी पार नहीं पा सकता |
अंश मात्र वर्णन ही
सम्भव था,
वह मैंने तुमको कह दिया |'
 
'इसके अतिरिक्त
जो कोई भी प्राणी
य जड़ वस्तु
ऐश्वर्य सम्पन्न
शोभा-कान्ति जैसे गुणों से
सम्पन्न है,
बल, तेज, पराक्रम जैसी शक्ति से
युक्त है,
उस प्राणी या
उस वस्तु को तुम
ईश्वर के तेज का अंश मानो |
उसे ईश्वर ही जानो |'
 
'एक ही है
जो अनन्त है,
असीम है,
अव्यक्त है |
हे अर्जुन!
एक तत्व ही मन में धारण करो |
ईश्वर की योगशक्ति को समझो |
 
सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड ईश्वर के
एक अंश में व्याप्त है |
जो कुछ है, वह ईश्वर से है |
जो हो रह है, वही ईश्वर है |'